शिक्षक दिवस पर विशेष…..

903


✍️अपर्णा मिश्रा
यूपी…

शिक्षा एक ऐसा शक्तिशाली औजार है जो स्वतंत्रता के स्वर्णिम द्वार को खोलकर दुनिया को बदल सकने की क्षमता रखता है| ब्रिटिशों के आगमन और उनकी नीतियों व उपायों के कारण परंपरागत भारतीय शिक्षा प्रणाली की विरासत का पतन हो गया और अधीनस्थ वर्ग के निर्माण हेतु अंग्रेजियत से युक्त शिक्षा प्रणाली का आरम्भ किया गया|

प्रारंभ में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी शिक्षा प्रणाली के विकास के प्रति गंभीर नहीं थी क्योकि उनका प्राथमिक उद्देश्य व्यापार करना और लाभ कमाना था| भारत में शासन करने के लिए उन्होंने उच्च व मध्यम वर्ग के एक छोटे से हिस्से को शिक्षित करने की योजना बनायीं ताकि एक ऐसा वर्ग तैयार किया जाये जो रक्त और रंग से तो भारतीय हो लेकिन अपनी पसंद और व्यवहार के मामले में अंग्रेजों के समान हो और सरकार व जनता के बीच आपसी बातचीत को संभव बना सके| इसे ‘निस्पंदन सिद्धांत’ की संज्ञा दी गयी| शिक्षा के विकास हेतु ब्रिटिशों ने निम्नलिखित कदम उठाये-

🔶शिक्षा और 1813 का अधिनियम

• चार्ल्स ग्रांट और विलियम विल्बरफोर्स,जोकि मिशनरी कार्यकर्ता थे ,ने ब्रिटिशों पर अहस्तक्षेप की नीति को त्यागने और अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार हेतु दबाव डाला ताकि पाश्चात्य साहित्य को पढ़ा जा सके और ईसाईयत का प्रचार हो सके| अतः ब्रिटिश संसद ने 1813 के अधिनियम में यह प्रावधान किया की ‘सपरिषद गवर्नर जनरल’ एक लाख रुपये शिक्षा के विकास हेतु खर्च कर सकते है और ईसाई मिशनरियों को भारत में अपने धर्म के प्रचार-प्रसार की अनुमति प्रदान कर दी|

• इस अधिनियम का इस दृष्टि से महत्व है कि यह पहली बार था जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में शिक्षा के विकास हेतु कदम उठाया |

• राजा राममोहन राय के प्रयासों से पाश्चात्य शिक्षा प्रदान करने के लिए ‘कलकत्ता कॉलेज’ की स्थापना की गयी | कलकत्ता  में तीन संस्कृत कॉलेज भी खोले गए|

🔶जन निर्देश हेतु सामान्य समिति,1823

इस समिति का गठन भारत में शिक्षा के विकास की समीक्षा के लिए किया गया था| इस समिति में प्राच्यवादियों का बाहुल्य था,जोकि अंग्रेजी के बजाय प्राच्य शिक्षा के बहुत बड़े समर्थक थे |इन्होने ब्रिटिश सरकार पर पाश्चात्य शिक्षा के प्रोत्साहन हेतु दबाव डाला परिणामस्वरूप  भारत में शिक्षा का प्रसार प्राच्यवाद और अंग्रेजी शिक्षा के भंवर में फंस गयी |अंततः मैकाले के प्रस्ताव के आने से ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली का स्वरुप स्पष्ट हो सका|

🔶लॉर्ड मैकाले की शिक्षा प्रणाली,1835

• यह भारत में शिक्षा प्रणाली की स्थापना का एक प्रयास था जिसमें समाज के केवल उच्च वर्ग को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्रदान करने की बात थी|

• फारसी  की जगह अंग्रेजी को न्यायालयों की भाषा बना दिया गया |

• अंग्रेजी पुस्तकों की छपाई मुफ्त में होने लगी और उन्हें सस्ते दामों पर बेचा जाने लगा |

• प्राच्य शिक्षा की अपेक्षा अंग्रेजी शिक्षा को अधिक अनुदान मिलने लगा |

• 1849 में बेथुन ने ‘बेथुन स्कूल’ की स्थापना की |

• पूसा (बिहार) में कृषि संस्थान खोला गया |

• रुड़की में इंजीनियरिंग संस्थान खोला गया|

🔶वुड डिस्पैच ,1854

• इसे ‘भारत में अंग्रेजी शिक्षा का मैग्नाकार्टा’ कहा जाता है क्योकि इसमें भारत  में शिक्षा के प्रसार के लिए समन्वित योजना प्रस्तुत की गयी|

• इसमें जनता में शिक्षा के प्रसार की जिम्मेदारी राज्य को सौंपने की बात कही गयी|

• इसने शिक्षा के एक पदानुक्रम का प्रस्ताव दिया-सबसे निचले स्तर पर वर्नाकुलर प्राथमिक स्कूल, जिला स्तर पर वर्नाकुलर हाईस्कूल और सम्बद्ध कॉलेज ,और कलकत्ता, मद्रास व बम्बई प्रेसिडेंसी के सम्बद्ध विश्वविद्यालय |

• इसने उच्च शिक्षा हेतु अंग्रेजी माध्यम और स्कूल शिक्षा के लिए देशी भाषा (वर्नाकुलर) माध्यम की वकालत की|
🔶हंटर आयोग(1882-83)

• इस आयोग का गठन डब्लू.डब्लू.हंटर की अध्यक्षता में 1854 के वुड डिस्पैच के तहत विकास की समीक्षा हेतु किया गया था|

• इसने प्राथमिक और सेकेंडरी शिक्षा में सुधार व प्रसार में सरकार की भूमिका को महत्व दिया |

• इसने शिक्षा के नियंत्रण की जिम्मेदारी जिला और म्युनिसिपल बोर्डों को देने की बात कही|

• इसने सेकेंडरी शिक्षा के दो रूपों में विभाजन किया –विश्विद्यालय तक साहित्यिक;वाणिज्यिक भविष्य हेतु रोजगारपरक शिक्षा |

🔶सैडलर आयोग

• वैसे तो इस आयोग का गठन कलकत्ता विश्विद्यालय की समस्याओं की के अध्ययन हेतु किया गया था लेकिन इसके सुझाव अन्य विश्वविद्यालयों पर भी लागू होते थे|

• इसके सुझाव निम्नलिखित थे:

a. 12 वर्षीय स्कूल पाठ्यक्रम

b. 3 वर्षीय डिग्री पाठ्यक्रम(इंटरमीडिएट के बाद)

c. विश्वविद्यालयों की केंद्रीकृत कार्यप्रणाली,

d. प्रयोगात्मक वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा हेतु सुविधाओं में वृद्धि,शिक्षक के प्रशिक्षण और महिला शिक्षा का सुझाव दिया|

🔶निष्कर्ष

अतःहम कह सकते है की ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली ईसाई मिशनरियों की आकांक्षाओं से प्रभावित थी| इसका वास्तविक उद्देश्य कम खर्च पर अधीनस्थ प्रशासनिक पदों पर शिक्षित भारतीयों को नियुक्त करना और ब्रिटिश वाणिज्यिक हितों की पूर्ति करना था| इसीलिए उन्होंने शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी को महत्त्व दिया और ब्रिटिश प्रशासन व ब्रिटिशों की विजयगाथाओं को महिमामंडित किया |
✍️: 📘Teachers’ Day 2020: जानिए कैसे एक गुरु के मार्गदर्शन ने एक साधारण लड़के को योग्य शासक बना दिया📘

गुरु का हमारे जीवन में विशेष महत्व होता है। ‘गु’ का मतलब होता है अंधकार (अज्ञान) और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश ज्ञान। भारत में गुरुओं का दर्जा मां-बाप से भी ऊपर होता है। भारतीय इतिहास पर नज़र डाली जाए तो गुरु की भूमिका समाज को सुधारने का काम करने के साथ-साथ क्रान्ति को दिशा दिखाने वाली भी रही है। भारतीय संस्कृति में गुरु की भूमिका निम्न श्लोक से स्पष्ट है:

“गुरुब्रह्मा गुरुविष्णु गुरुदेवो महेश्वर: ।गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः”

इस शिक्षक दिवस के मौके पर नज़र डालते हैं एक ऐसे ही गुरु पर जिन्होंने एक साधारण से बालक को राज गद्दी पर बैठा दिया। 

चाणक्य और चद्रगुप्त मौर्य का नाम तो सभी ने सुना होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कैसे चाणक्य ने अपनी नीतियों के बल पर चंद्रगुप्त को राजा बना दिया?

जब चाणक्य छोटे थे तो उनके घर एक ज्योतिषी आए। चाणक्य की मां ने उन्हें चाणक्य की जन्मपत्री दिखाई। जन्मपत्री देखकर ज्योतिषी तो बहुत खुश हुए लेकिन चाणक्य की मां दुखी हो गईं क्योंकि जन्मपत्री में राजयोग था। इसके बाद ज्योतिषी ने चाणक्य को बुलवाया और आगे के दांतों में नागराज का चिन्ह देखकर प्रसन्न हो उठे। नागराज का चिन्ह इस बात का सबूत था कि चाणक्य आने वाले दिनों में राज करेंगे। 

ज्योतिषी के जाने के बाद चाणक्य की मां परेशान रहने लगीं। जब चाणक्य से अपनी परेशान मां को नहीं देखा गया तो उन्होंने जानने की कोशिश की। इस पर उनकी मां ने कहा कि राजा बनने के बाद वक्त की कमी के कारण मां-बेटे अलग हो जाएंगे। इतना सुनते ही चाणक्य ने अपने आगे के दांत निकाल दिए जिसमें नागराज का चिन्ह था। इसके बाद चाणक्य की मां के चेहरे खुशी की लहर दौड़ गई। 

चाणक्य ने नागराज वाले चिन्ह के दांत ज़रूर उखाड़ दिए थे लेकिन राजा धनानंद के साथ-साथ पूरे राज्य में चाणक्य के बारे में पता चल चुका था।

कुछ सालों के बाद राजा धनानंद की ओर से एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें भिक्षुओं को सम्मानित किया जाना था। उस कार्यक्रम में चाणक्य भी मौजूद थे। राजा धनानंद को जैसे ही इस बात का पता चला उन्होंने चाणक्य को देश से निकल जाने का आदेश दे दिया। 

राजा की इस बात से चाणक्य आहत हो गए और उन्होंने राजा को बर्बाद करने की ठान ली। देश से निकालने के लिए सैनिक जब उन्हें लेकर जा रहे थे, तभी मौका पाकर चाणक्य वहां से भागकर जंगल में पहुंच गए। कुछ समय बाद चाणक्य ने बड़ी चालाकी के साथ राजा धनानंद के बेटे पाब्बता से दोस्ती कर ली। 

जंगल से गुज़रते वक्त चाणक्य की नज़र एक बच्चे पर पड़ी जो राजा की नकल कर था। उसके कुछ दोस्त डाकू बने हुए थे और वे उन्हें पकड़ रहा था। उस बच्चे के चेहरे पर अजब सा तेज था। चाणक्य उस बच्चे से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उस बच्चे को अपने साथ रखना शुरु कर दिया और उसे  राजनीति, रणनीति और युद्धनीति की शिक्षा देने लगे। आपको जानकर हैरानी होगी कि ये बच्चा और कोई नहीं खुद चंद्रगुप्त मौर्य ही थे। 

चाणक्य के सामने एक बड़ी चुनौती थी। वे चंद्रगुप्त और पाब्बता में से किसी एक को ही राजा बना सकते थे। ऐसे में उन्होंने परीक्षा के तौर पर पाब्बता को बुलाया और कहा कि चंद्रगुप्त सो रहा है और उसे बिना जगाए उसके शरीर से धागा उतार लाए। अगर धागा निकालने में कोई मुश्किलात सामने आए तो वे चंद्रगुप्त की हत्या कर दे। पाब्बता अंदर गए लोकिन सोए हुए चंद्रगुप्त को देखकर उनका दिल पसीज गया और वे बाहर चले गए। बाहर जाकर उन्होंने चाणक्य से कहा कि सोए हुए व्यक्ति की हत्या करना अधर्म है और वे ये अधर्म नहीं कर सकते। इतना सुनकर चाणक्य ने पाब्बता से जाने को कहा। 

अगले दिन चाणक्य ने पाब्बता को मारने का काम चंद्रगुप्त को सैंपा। चंद्रगुप्त जब पाब्बता के नज़दीक पहुंचे तो उन्होंने पाया कि ये काम इतना आसान नहीं है  लेकिन गुरु की बात काटना अधर्म है। ऐसे में चंद्रगुप्त ने पाब्बता का सिर धड़ अलग कर दिया और चाणक्या को धागा सौंप दिया। 

इसके बाद चाणक्य ने चंद्रगुप्त को अपना शिष्य बना लिया और आगे चलकर एक साधारण से लड़के को भारत का राजा बना दिया। इस घटना के कई वर्षों बाद एक सेना का निर्माण किया गया और राजा धनानंद के राज्य पर हमला कर सत्ता पर चंद्रगुप्त को काबिज किया। इस तरह चाणक्य ने न सिर्फ अपने अपमान का बदला लिया बल्कि सत्ता पर भी कब्ज़ा कर लिया। 

🔻चाणक्य नीतियां

चाणक्य ने अपनी बुद्धि और कौशल के बल पर एक साधारण से लड़के चंद्रगुप्त को राज गद्दी पर बैठा दिया। चाणक्य ने नीती ग्रंथ की रचना की थी जिसमें सत्ता पर काबिज़ होने और सत्ता संभालने से संबंधित कई नीतियों के बारे में जानकारी दी गई। 

1- जो राजा धर्म में आस्था रखता है, वही देश के जन मानस को सुख पहुंचा सकता है। सद्विचार और सद् आचरण को धर्म माना जाता है। जिसमें ये दो गुण हैं वही राजा बनने योग्य है।

2- जो राजा प्रजा का पालन करने के लिए धन की समुचित व्यवस्था रखता है और राज्य संचालन के लिए यथोचित राज-कोष एकत्र रखता है, उसकी सुरक्षा को कभी भय नहीं हो रहता।

3- एक योग्य राजा को सदैव अपने पड़ोसी राजा के हितों का ध्यान रखना चाहिए और हमेशा सावधान रहना चाहिए। क्योंकि प्राय ये देखा जाता है कि सीमा के निकट वाले राज्य किसी न किसी बात पर आपस में लड़ पड़ते हैं और एक दूसरे के शत्रु बन जाते हैं। जिससे दोनों ही राज्यों का नुकसान होता है।

4- किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले तीन सवाल अपने आप से जरूर पूछें- मैं यह क्यूं कर रहा हूं. इसका परिणाम क्या होगा, क्या सफलता मिलेगी। अगर कोई भी राजा इन तीन सवालों को ध्यान में रखते हुए कोई भी कार्य करता है तो उसे सफलता जरूर मिलेगी। जो उसकी प्रजा के लिए भी अच्छा होगा।

5- राजनीति यही है कि किसी को भी अपनी गुप्त बाते नहीं बताओं नहीं तो आप तबाह हो सकते हैं।

6- हमेशा इस बात का ध्यान रखें कि हर मित्रता में कोई न कोई स्वार्थ छिपा होता है।
✍️ 📘Teachers Day 2020: इतिहास, महत्व और अन्य तथ्य 📘

🔻Teachers Day 2020: भारत में,डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन – भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति और एक शिक्षाविद् के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है. 

डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक महान दार्शनिक व शिक्षक थे और उन्होने शिक्षा के क्षैत्र मे अभूतपूर्व योगदान दिया था. उनका विश्वास था कि शिक्षको को देश मे सर्वाधिक प्रतिभशाली होना चाहिये.

शिक्षक हमारे भविष्य का आधार होतें हैं और ज़िम्मेदार नागरिक व अच्छे इंसान पैदा करना शिक्षको का दायित्व है। इस दिन हम शिक्षकों के कठिन परिश्रम द्वारा हमारे विकास मे दिये गये उनके योगदान के लिए उनका अभिवादन करते हैं.

इस दिन का छात्र बड़ी अपेक्षाए लेकर आते हैं,साथ ही सच्चे जज़्बे से भी. शिक्षक दिवस पर, एक शिक्षक की तरह काम करके छात्र शिक्षको के उत्तरदायित्वो से परिचित होते हैं जोकि उनके शिक्षक बहुत अच्छी तरह से निभाते हैं.

इस दिन छात्र अपने प्रिय शिक्षकों के लिए तोहफें लाते हैं। यह दिन शिक्षकों के लिए भी बहुत खास होता है क्योकि इसी दिन शिक्षकों को पता लगता है कि उनके शिष्य उन्हे कितना पसंद करते हैं.

🔶शिक्षक दिवस क्यों मनाया जाता है?

भारत में शिक्षक दिवस 5 सितंबर को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है. वह एक प्रसिद्ध विद्वान, भारत रत्न पाने वाले, प्रथम उपराष्ट्रपति और स्वतंत्र भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे. उनका जन्म 5 सितंबर, 1888 को हुआ था। एक शिक्षाविद् के रूप में, वे एक अधिवेशन के अधिवक्ता, शिक्षाविद और महान शिक्षक थे.

जैसा कि आम कहावत है, किसी देश का भविष्य उसके बच्चों के हाथों में होता है, और शिक्षक, गुरु के रूप में, छात्रों को भविष्य के नेताओं में ढाल सकते हैं जो भारत के भाग्य को आकार देते हैं. करियर और व्यवसाय में सफल होने के लिए वे हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. वे हमें एक अच्छा इंसान, समाज का एक बेहतर सदस्य और देश का एक आदर्श नागरिक बनने में मदद करते हैं. शिक्षक दिवस चुनौतियों, कठिनाइयों और शिक्षकों द्वारा हमारे जीवन में निभाई जाने वाली विशेष भूमिका को स्वीकार करने के लिए मनाया जाता है.

1962 में डॉ. राधाकृष्णन भारत के राष्ट्रपति बने. उनके कुछ मित्रों और छात्रों ने उनसे संपर्क किया और  उनसे 5 सितंबर को अपना जन्मदिन मनाने की अनुमति देने का अनुरोध किया. डॉ. एस. राधाकृष्णन ने जवाब दिया, “मेरे जन्मदिन को विवेकपूर्ण ढंग से देखने के बजाय, अगर 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए तो यह मेरे लिए बहुत ही सौभाग्य की बात होगी.” भारत के राष्ट्रपति से आने वाले इस तरह के अनुरोध ने शिक्षकों के लिए डॉ. एस. राधाकृष्णन के स्नेह और समर्पण को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया. तब से, भारत में 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है.

🔶शिक्षक दिवस कैसे मनाया जाता है?

शिक्षक दिवस पर, छात्र स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों के मनोरंजन के लिए विभिन्न गतिविधियाँ करते हैं. इन गतिविधियों में गायन प्रतियोगिता, नृत्य प्रतियोगिता, कविताओं का सस्वर पाठ, शिक्षकों की नकल, बच्चों के बहुत सारे खेल, शिक्षकों के साथ खेलना, पिकनिक की योजना बनाना, उपहार देना और अंत में, वे अपना आभार व्यक्त करके शिक्षकों का धन्यवाद करते हैं.

शिक्षक दिवस शिक्षकों और छात्रों के बीच संबंधों को मनाने और एक साथ समय व्यतीत करने का एक महान अवसर है. इसलिए, इस दिन शिक्षक अपने शिक्षकों से मिलने की कोशिश करते हैं. यदि वे दूर हैं तो उन्हें संदेश भेज कर विश करते हैं और उनके दिन को यादगार बनाते हैं और साथ ही उनका धन्यवाद देते हैं.
✍️ 📘Teachers Day 2020: भारत में शिक्षक दिवस की शुरूआत कैसे हुई?📘

🔻Teachers Day 2020: डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को तमिलनाडू के तिरूतानि मे एक मध्यवर्गीय परिवार मे हुआ था। सन् 1962 से भारत में प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह तिथि हमें महान दार्शनिक और शिक्षक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस एवं शिक्षा के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान की याद दिलाता है। डॉ. राधाकृष्णन का मानना ​​था कि “देश के सर्वश्रेष्ठ विद्वानों को शिक्षक बनना चाहिए”।

🔶क्या आप जानते हैं कि भारत में शिक्षक दिवस की शुरूआत कैसे हुई?

 एक बार डॉ. राधाकृष्णन के जन्मदिन के शुभ अवसर पर उनके छात्रों और दोस्तों ने उनसे उनके जन्मदिन का जश्न मनाने की अनुमति माँगी लेकिन जवाब में डॉ राधाकृष्णन ने कहा कि “मेरे जन्मदिन का जश्न मनाने के बजाय अगर 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी|” शिक्षकों के बारे में डॉ राधाकृष्णन का मानना था कि समाज और देश की विभिन्न बुराइयों को शिक्षा के द्वारा ही सही तरीके से हल किया जा सकता है।

यह बात सर्वविदित है कि “शिक्षक ही एक सभ्य और प्रगतिशील समाज की नींव रखता है| उनके समर्पित काम और छात्रों को प्रबुद्ध नागरिक बनाने के लिए उनके अथक प्रयास प्रशंसनीय योग्य हैं|”

इसके अलावा, डॉ राधाकृष्णन की इच्छा थी कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होना चाहिए और शिक्षकों, छात्रों और शिक्षा पद्धति के बीच एक मजबूत संबंध विकसित होना चाहिए| कुल मिलाकर वे पूरी शिक्षा प्रणाली में बदलाव चाहते थे| उनके अनुसार शिक्षकों को विद्यार्थियों का स्नेह और सम्मान प्राप्त करने के लिए आदेश नहीं देना चाहिए बल्कि उन्हें इसके योग्य बनना चाहिए।

इसलिए, शिक्षक हमारे भविष्य के आधारस्तंभ हैं और वे हमें जिम्मेदार नागरिक और अच्छा मनुष्य बनाने के लिए नींव के रूप में काम करते हैं| यह दिन हमारे विकास की दिशा में हमारे शिक्षकों द्वारा की गयी कड़ी मेहनत के प्रति आभार एवं सम्मान प्रकट करने के लिए मनाया जाता है। 
🔻डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म वर्ष 1888 में आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु राज्यों की सीमा के पास मद्रास प्रेसीडेंसी में एक मध्यम वर्गीय तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे वीर समय्या के दूसरे पुत्र थे, जो पेशे से तहसीलदार थे| उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र विषय में स्नातक किया था और M.A में “वेदांत और उसकी आध्यात्मिक पूर्वधारणाएं” विषय पर शोधपत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने वेदांत प्रणाली की नैतिकता के महत्व का वर्णन किया था| उनके प्रमुख कार्यों में से एक भारतीय दर्शन को “शैक्षणिक दृष्टि से विशिष्ट शब्दावली” के रूप में अनुवादित करना है जो पाश्चात्य मानकों के अनुसार दर्शन कहलाने योग्य है| इसलिए उन्हें भारतीय दर्शन के क्षेत्र में बहुत सम्मान प्राप्त था| उन्हें 1931 में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए गठित राष्ट्रों की समिति के लिए भी नामांकित किया गया था| 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो डॉ. राधाकृष्णन ने यूनेस्को में भारत का प्रतिनिधित्व किया और 1949 से 1952 तक वे सोवियत संघ में भारत के राजदूत थे| उन्हें भारत की संविधान सभा के लिए भी निर्वाचित किया गया था और बाद में वे भारत के पहले उपराष्ट्रपति और अंततः 1962-67 तक भारत के राष्ट्रपति रहे| उन्हें 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया और उनकी स्मृति में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने राधाकृष्णन चेवेनिंग छात्रवृत्ति और राधाकृष्णन मेमोरियल पुरस्कार की शुरूआत की। उन्हें 1961 में जर्मन बुक ट्रेड के शांति पुरस्कार से भी नवाजा गया था।

आश्चर्य की बात यह है कि राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे बहुत ही विनम्र स्वभाव के व्यक्ति थे और आप जानते हैं कि उनके कार्यकाल में ही राष्ट्रपति भवन को सभी के लिए खोला गया था और समाज के प्रत्येक वर्ग के लोग उनसे मिल सकते थे| वे अपने वेतन के रूप में मिलने वाले 10,000 रुपये में से केवल 2500 रुपये स्वीकार करते थे और हर महीने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में शेष राशि दान कर देते थे| 17 अप्रैल 1975 को डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन का निधन हो गया था|

वर्तमान समय में भी छात्र उत्सुकतापूर्वक शिक्षक दिवस का इंतजार करतें हैं और अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान की भावना के साथ इस तिथि को मनाते हैं| इस अवसर पर विभिन्न स्कूलों, कॉलेजों एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा सम्मान समारोह एवं मनोरंजन के कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, जिसमे छात्र-छात्राएं बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं और नृत्य, गायन एवं अभिनय के माध्यम से शिक्षकों को सम्मान देते हैं एवं उनका आभार प्रकट करते हैं|

छात्र-छात्राएं अपने पसंदीदा शिक्षकों के लिए उपहार लाते हैं| यह दिन शिक्षकों के लिए भी बहुत विशेष होता है, क्योंकि इस दिन उन्हें पता चलता है कि उनके शिष्य उन्हें कितना प्यार और सम्मान देते हैं|

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here