सांझ का दीया

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किसीने आवाज़ दी है हमें
अपनी ख़ामोश तनहाइयों में
शायद सिंदूरी साँझ ने
दीया जलाया है
पुरवाईयों में
आंखों से अगर ओझल
हों भी तो क्या
उनका अक्स नज़र आता है
मुझे मेरी परछाइयों में

शामिल कर लेना हमें
अपनी तनहा उदासियों में
शिकायत कर लेना
हमीं से हमारी वीरानियों में
मिलन की राह से
अगर दूर भी हो तो क्या
आपकी यादें झलकती रहेंगी चाहत भरी निशानियों में


रंजना फतेपुरकर
इंदौर
मो 98930 34331

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