ग़ज़ल

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तेरे दिल का अब हमको हर काशाना मंज़ूर हुआ
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में मर जाना मंज़ूर हुआ

उठने लगीं हैं काली घटायें छलके  हैं जाम-ओ-साग़र
ऐसे आलम में तुझको भी बलखाना मंज़ूर हुआ

महकी महकी गुलमेंहदी है चाँद सितारे भी रौशन
ऐसे मौसम में उनको भी तरसाना मंज़ूर हुआ

लहराता है ज़ुल्फें कोई अपने रुख-ऐ-मुनव्वर पर
उनका फूलों सा हमको यह नज़राना मंज़ूर हुआ

चाहे जितनी घोल दे नफ़रत ऐ साक़ी पैमानों में
मेरी चाहत को तेरा हर पैमाना मंज़ूर हुआ

ज़हर-ए-ग़म का जाम पिया है हमने उनके हाथो से
अपनी मौत का यार हमें यह परवाना मंज़ूर हुआ

मेरे नाम के साथ महकता हो उनका भी नाम अगर
मेरे खूँ से भी लिख दो तो अफ़साना मंज़ूर हुआ

उनके चेहरे पर रौनक़ है देख लो मेरी मय्यत में
उनकी मर्ज़ी को शायद यह नज़राना मंज़ूर हुआ

लगवाते हैं बुत मेरा वो बाद मेरे मर जाने के
दुनिया वालों को अब देखो दीवाना मंज़ूर हुआ

साग़र हम भी आ जाते हैं आखिर दिल की बातों में
आज हमें पत्थर से शीशा टकराना मंज़ूर हुआ

🖋विनय साग़र जायसवाल

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