अमरदीप नारायण प्रसाद
कोरोना के दौरान जब रेलवे ने वायरस के नाम पर पैसेंजर रेलगाड़ी को बंद कर दिया। जिसका सबसे अधिक नुकसान छात्र, मजदूर, किसान, नौजवान को उठाना पड़ रहा है। हालात ये है कि जो व्यक्ति घर से शहर तक की दूरी 10-20 रुपये में तय कर लिया करते थे। उनको अब प्रतिदिन लगभग 150-250 रुपये तक लगाने पर रहे हैं। गाँवों के विकास की रफ़्तार धीमी हो चकी है। लोग शहरों से दूर होने के कारण गाँवों में अब दुगुनी, तीन गुनी किमत पर सामान खरीद रहे हैं।
छोटे- छोटे रेलवे स्टेशन के नजदीक के बाजार, पेठिया की स्थिति बंद होने के कगार पर हैं। जो व्यक्ति अपने घर के नजदीक में रहकर 300 रुपया तक कमा लेता था। अब काम नहीं मिल रहा है। रेलवे स्टेशन के नजदीक बाजार में जो व्यक्ति सब्जी का बोड़ी उठाकर मात्र कुछ ही समय में 2
100-200 रुपये बचा लेता था अब उनको उस तरह का काम ही नहीं मिल पा रही है। क्योंकि जो सब्जी गाँवों से दूर जाकर दूर- दराज के क्षेत्रों में अपनी पहचान बनायी थी अब वो ताजी सब्जी थाली से दूर हो गयी है।
सवारी गाड़ी जो गाँवों के बच्चों का भविष्य शिक्षा के माध्यम से बनाने का प्रयास किया करती थी वो अब उनके पढाई को ही वंचित कर दी है। अधिकांश परिवारों की स्थिति ये नहीं है कि वो अपने एक बच्चों का प्रत्येक दिन बस या अन्य गाड़ी से पढा़ई के लिए भेज सके। तो क्या उन गरीब परिवारों के बच्चों को उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त करने का हक नहीं है? क्या सिर्फ साक्षरता दर बढा़ना ही सरकार का उद्देश्य रह गया है? उच्च क्वालिटी की शिक्षा कैसे आयेगी इस पर बात कौन करेगा? छोटे – छोटे क्षेत्रों में महाविद्यालय नहीं है अगर हैं भी तो उसमें शिक्षक नहीं है? क्या आपको नहीं लगता कि शिक्षा के नाम पर सिर्फ डिग्रीधारी की संख्या दिन- प्रतिदिन बढ़ती जा रही है?
सबसे ज्यादा हालात खराब मुजफ्फरपुर- समस्तीपुर रूट के सवारी रेलगाड़ियों की है। पहले जो मिथिला एक्स्प्रेस समस्तीपुर से मुजफ्फरपुर के रास्ते में चलकर छात्रों को भविष्य बनाने में अपनी अहम भूमिका छोटे- छोटे स्टेशनों पर रुककर निभाती थी अब वो इस रास्ते में तो चलती है लेकिन इन छात्रों के भविष्य के लिए नहीं अपनी कमाई को बढ़ाने के लिए मात्र। स्यालदह सीतामढ़ी पैसेंजर जो हजारों छात्रों का भविष्य प्रत्येक दिन बनाने के क्रम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का प्रयास करती थी। पता नहीं अब वह कहाँ चली गयी हैं क्या वह दुबारा इस पटरी पर नहीं लौट पाएगी। सीवान- समस्तीपुर पैसेंजर जो थके हारे लोगों का सहारा हुआ करती थी अब वो लापता हो चुकी है। क्या हमारी सरकार, प्रशासन, रेलवे ये सब मिलकर इनको ढूँढ़कर यात्रियों की यात्रा को सुलभ बनाने के लिए एक कदम आगे बढ़ायेगी।
सरकार के लोग कहते हैं कि हमारे पास डब्बे नहीं है। रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष, मुजफ्फरपुर के माननीय सांसद, सताधारी बीजेपी के नेता कहते हैं कि हमारी बात को हमारे ही विभाग में कोई नहीं सुनता है, आपलोगों का पता नहीं। रेलवे के डीआरएम कहते हैं कि अपने क्षेत्र के सांसद से मंत्रालय में बात करवाइए जो करेंगे वही करेंगे।
आपको अपने समाज के लोगों के बारे में अच्छी तरह से पता होगी। क्या वे रोजगार के लिए परेशान नहीं हैं? क्या उन्हें जाति, धर्म, संप्रदाय के नाम पर, ऊँच- नीच के नाम पर उनके विश्वास को लूटा नहीं जाता है? आखिर कब अंतिम पायदान के बच्चें सबसे ऊच्च शिक्षा को पा सकेंगे? सरकार कब अपनी जवाबदेही तय करेगी?
रुपेश रॉय























































