जीवन की पहली लड़ाई: एसएनसीयू पूर्णिया ने कैसे हर साल हजारों बच्चों को दी जीत।

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-एक पिता की व्यथा से लेकर सरकारी स्वास्थ्य सेवा की अभूतपूर्व सफलता तक की हृदयस्पर्शी यात्रा

पूर्णिया, 08 दिसंबर 2025

मो यूनुस के लिए, जून 2025 की वह रात शायद कभी भुलाई नहीं जा सकेगी। जब उनके बेटे का जन्म हुआ और उस नन्ही जान ने रोने से इनकार कर दिया, तो समय थम सा गया था। जन्म के बाद आधा घंटा का वह इंतजार यूनुस के लिए सदी जैसा लंबा था।
लेकिन, यही वह क्षण था जब सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली की मानवीय संवेदनशीलता सामने आई। गाँव के अस्पताल की एएनएम ने स्थिति की गंभीरता को समझा और तुरंत बच्चे को पूर्णिया के विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में भेजने की सलाह दी।
मो यूनुस के दिल में दहशत थी, लेकिन पूर्णिया राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय एवं अस्पताल (जीएमसीएच) के इमरजेंसी वार्ड में डॉक्टरों की तत्परता ने उस डर को उम्मीद में बदल दिया। यूनुस ने अपनी आवाज़ में भावनात्मक उतार-चढ़ाव के साथ बताया, “इमरजेंसी में डॉक्टरों द्वारा बेहतर उपचार और दवाई देने के बाद सुबह तक बच्चे के जान में जान लाई और बच्चा रोने लगा। बच्चे की आवाज़ सुनने के बाद फिर हमारी जान में जान आई।”

अनस: लाखों सफल कहानियों का एक अंश

बच्चे को विशेष देखभाल के लिए जीएमसीएच के एसएनसीयू में भर्ती कराया गया। यहाँ, अनस को तीन दिन तक सघन चिकित्सा दी गई। डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया था कि यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक बच्चा पूरी तरह से ठीक होकर दूध पीना शुरू नहीं कर देता।

और यही वह जगह है जहाँ आँकड़ों को जीवन मिलता है। मो यूनुस का बेटा अनस, उन 11,983 नवजात शिशुओं में से एक है जिन्हें एसएनसीयू पूर्णिया ने अप्रैल 2020 से नवंबर 2025 के बीच मौत के मुँह से खींचकर वापस जीवन की रोशनी दी है।

जीएमसीएच शिशु विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ प्रेम प्रकाश गर्व से बताते हैं कि कैसे उनकी टीम ने 19,104 नवजात शिशुओं को भर्ती किया, और उनमें से लगभग 12,000 बच्चों को सुरक्षित घर भेजा। यह महज एक संख्या नहीं है; यह 11,983 परिवारों की अटूट खुशी है।

विश्वास और निःशुल्क उपचार

अनस का स्वस्थ होना केवल डॉक्टरों की दक्षता नहीं, बल्कि एक सरकारी वादे की पूर्ति भी थी। यूनुस बताते हैं कि उन्हें बेटे के पूरे इलाज के लिए एक भी रुपया खर्च नहीं करना पड़ा जाँच से लेकर दवाई तक, सब कुछ निःशुल्क मिला।
यह स्वास्थ्य सेवा की वह खामोश क्रांति है जो सिर्फ 2025 में ही 2,282 नवजात शिशुओं को स्वस्थ जीवन दे चुकी है। मो यूनुस की कहानी हमें यह बताती है कि जब स्वास्थ्यकर्मी तत्पर हों और व्यवस्था साथ दे, तो सरकारी अस्पताल गरीब और ज़रूरतमंद परिवारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं। अनस आज पूरी तरह स्वस्थ है, और वह इस बात का जीवित प्रमाण है कि भारत के सुदूर क्षेत्रों में भी, हर बच्चे को जीने का पूरा अवसर मिल रहा है।

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