प्रदीप कुमार नायक
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार_
कानून का राज किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होता है। जब आम आदमी को यह भरोसा हो कि उसे न्याय समय पर मिलेगा, बिना डर के मिलेगा और बिना भेदभाव के मिलेगा, तभी वह राज्य को अपना मानता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ संविधान है, संसद है, न्यायपालिका है, पुलिस है। फिर भी आज गली से लेकर सोशल मीडिया तक एक ही आवाज सुनाई देती है — क्या कानून सबके लिए बराबर है? क्या न्याय वाकई अंधा है? यह सवाल एक दिन में नहीं उपजा। यह रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं से बना है।
कानून की किताबें कहती हैं कि हर नागरिक बराबर है। पर जमीनी हकीकत में कानून की पहुंच और उसकी गति दोनों पर सवाल हैं। देश की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं। एक मुकदमा शुरू होता है और पीढ़ियां बीत जाती हैं। गवाह थक जाते हैं, सबूत पुराने पड़ जाते हैं, और कई बार पीड़ित खुद ही हार मान लेता है। न्याय में देरी को अन्याय कहा गया है। जब न्याय इतना धीमा हो कि लोग समझौता करने पर मजबूर हों, तो कानून का डर नहीं, कानून से निराशा पैदा होती है।
दूसरी तरफ पुलिस है। पुलिस को जनता का मित्र कहा जाता है, पर कई बार आम आदमी थाने जाने से पहले सौ बार सोचता है। एफआईआर लिखवाना, गवाही देना, जांच में सहयोग करना, यह सब प्रक्रिया इतनी जटिल और थका देने वाली है कि लोग चुप रहना बेहतर समझते हैं। साइबर अपराध, महिलाओं के खिलाफ अपराध, जमीन के फर्जीवाड़े इन मामलों में पीड़ित को पहले सिस्टम से लड़ना पड़ता है, फिर अपराधी से,और जब पुलिस पर राजनीतिक दबाव या संसाधनों की कमी की बात आती है, तो आम आदमी बीच में पिसता है।
कानून बदल भी रहे हैं। भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के आने से पुराने औपनिवेशिक कानूनों को हटाने की कोशिश हुई है। यह स्वागत योग्य कदम है। पर कानून बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती। जब तक अदालतों में जजों की भारी कमी है, जब तक फॉरेंसिक लैब और आधुनिक जांच के साधन हर जिले तक नहीं पहुंचते, जब तक पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक नए कानून भी फाइलों में ही रह जाएंगे।
आज सबसे बड़ा सवाल तकनीक और कानून के टकराव का है। सोशल मीडिया पर एक अफवाह आग लगा देती है। फर्जी वीडियो से किसी की इज्जत तार-तार हो जाती है। साइबर ठगी से बूढ़े मां-बाप की जीवनभर की कमाई चली जाती है। कानून इन नए अपराधों को पकड़ने के लिए भाग रहा है, पर अपराधी उससे दो कदम आगे चल रहे हैं। ऐसे में कानून की विश्वसनीयता तभी बचेगी जब वह तेज, पारदर्शी और तकनीक-सक्षम बने।
एक और असहज सच्चाई यह है कि कानून के इस्तेमाल में दोहरापन दिखता है। शक्तिशाली के लिए कानून में छूट के रास्ते निकल आते हैं और कमजोर के लिए कानून एक दीवार बन जाता है। जब कोई प्रभावशाली व्यक्ति घंटों में जमानत ले लेता है और कोई गरीब सालों तक जेल में सड़ता है, तो लोग पूछते हैं — क्या संविधान की प्रस्तावना में लिखा “समानता” सिर्फ कागज के लिए है?
इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ अंधकार है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने कई बार सरकार और सत्ता को आईना दिखाया है। जनहित याचिकाओं ने आम आदमी को आवाज दी है। लोक अदालतों और ई-कोर्ट की पहल से न्याय को घर तक लाने की कोशिश हो रही है। पुलिस के भीतर भी ऐसे अफसर हैं जो रात-दिन मेहनत कर रहे हैं। पर अपवाद से नियम नहीं बनता।
कानून व्यवस्था का संकट केवल पुलिस या जजों का संकट नहीं है। यह हमारे सामाजिक व्यवहार का भी संकट है। जब हम कानून को तोड़कर गर्व करते हैं, जब हम “पहचान” और “संपर्क” से काम करवाने को सामान्य मान लेते हैं, जब हम भीड़ के साथ खड़े होकर कानून हाथ में ले लेते हैं, तब हम खुद उस व्यवस्था को कमजोर कर रहे होते हैं जिसकी हम रक्षा चाहते हैं।
इसके लिए रास्ता यह हैं कि सबसे पहले न्याय को तेज करना होगा। लंबित मामलों को निपटाने के लिए ज्यादा अदालतें, ज्यादा जज और वैकल्पिक विवाद समाधान को बढ़ावा देना होगा। दूसरा, पुलिस सुधार अब और टाला नहीं जा सकता। पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त, जवाबदेह और संवेदनशील बनाना होगा। थाने को भय का केंद्र नहीं, विश्वास का केंद्र बनाना होगा। तीसरा, कानून को भाषा और तकनीक दोनों में आम आदमी तक लाना होगा। जब एक किसान अपनी भाषा में अपनी अर्जी दाखिल कर सके और एक छात्र ऑनलाइन अपनी शिकायत दर्ज करवा सके, तभी कानून जिंदा होगा।
सबसे जरूरी बात यह हैं कि कानून के प्रति सम्मान होना चाहिए l यह सम्मान डर से नहीं, भरोसे से आता है। जब लोग देखेंगे कि कानून अमीर-गरीब, जाति-धर्म नहीं देखता, तब वे खुद कानून का साथ देंगे।
भारत का संविधान दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव है। पर नींव पर इमारत तभी खड़ी होगी जब ईंट-ईंट जोड़ने वाले ईमानदार हों। कानून व्यवस्था कोई सरकार की जागीर नहीं है। यह हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।
जिस दिन एक आम आदमी यह कह सकेगा कि “मुझे न्याय मिलेगा, भले देर से मिले पर जरूर मिलेगा”, उसी दिन हम कह पाएंगे कि भारत में कानून का राज सच में स्थापित है। तब तक सवाल पूछते रहना ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत हैं l



















































