योग एक विज्ञान हैं

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प्रदीप कुमार नायक
मधुबनी:
योग कोई धर्म नहीं है, यह बात स्मरण रहे। योग हिंदू नहीं है, मुसलमान नहीं है। योग तो एक विशुद्ध विज्ञान है—गणित, फिजिक्स या कैमिस्ट्री की तरह। फिजिक्स न तो ईसाई है और न बौद्ध। चाहे ईसाइयों द्वारा ही फिजिक्स के नियमों की खोज की गयी हो, लेकिन फिर भी इस विज्ञान को ईसाई नहीं कहा जा सकता। यह संयोग मात्र है कि ईसाइयों ने फिजिक्स के नियमों का अन्वेषण किया। भौतिकी विज्ञान तो मात्र विज्ञान है। और योग भी मात्र एक विज्ञान है। यह फिर एक संयोगपूर्ण घटना ही है कि हिंदुओं ने योग को खोजा। लेकिन इससे यह हिन्दू तो न हुआ। यह तो एक विशुद्ध गणित हुआ आंतरिक अस्तित्व का। इसलिए एक मुसलमान भी योगी हो सकता है; ईसाई भी योगी हो सकता है। इसी तरह एक जैन, एक बौद्ध भी योगी हो सकता है।
योग तो शुद्ध विज्ञान है। और जहां तक योग—विज्ञान की बात है पतंजलि इस क्षेत्र के सबसे बड़े नाम हैं। यह पुरुष विरल है। किसी अन्य की पतंजलि के साथ तुलना नहीं की जा सकती। मनुष्यता के इतिहास में धर्म को पहली बार विज्ञान की अवस्था तक लाया गया। पतंजलि ने धर्म को मात्र नियमों का विज्ञान बना दिया, जहां विश्वास की जरूरत नहीं है।
सब तथाकथित धर्मों को विश्वासों की जरूरत रहती है। धर्मों में परस्पर कोई विशेष अंतर नहीं है। अंतर है तो उनकी अलग–अलग धारणाओं में ही। एक मुसलमान के अपने विश्वास हैं; इसी तरह हिन्दू और ईसाई के अपने—अपने विश्वास हैं। अंतर तो विश्वासों में ही है। जहां तक विश्वासों की बात है, योग इस विषय में कुछ नहीं कहता। योग तो तुम्हें किसी बात पर विश्वास करने को नहीं कहता। योग कहता है : अनुभव करो। जैसे विज्ञान कहता है : प्रयोग करो, योग कहता है अनुभव करो। प्रयोग और अनुभव एक ही बात है, उनकी दिशाएं अलग—अलग हैं। प्रयोग का अर्थ है कि तुम कुछ बाहर की और कर रहे हो अनुभव का अर्थ है कि तुम कुछ अपने भीतर कर रहे हो। अनुभव है एक आंतरिक प्रयोग।
विज्ञान कहता है, विश्वास मत करो; जितना बन पड़े संदेह ही करो। लेकिन अविश्वास भी मत करो, क्योंकि अविश्वास भी एक तरह का विश्वास ही है। तुम ईश्वर में विश्वास कर सकते हो या तुम निरीश्वरवाद की धारणा में विश्वास बना सकते हो। तुम आग्रह पूर्वक कह सकते हो कि ईश्वर है या इसके विपरीत उसी हठधर्मी के साथ कह सकते हो कि ‘ईश्वर नहीं है’। आस्तिक और नास्तिक दोनो ही विश्वासी है। लेकिन विश्वास विज्ञान की दिशा नही है। विज्ञान का अर्थ है. ‘जो है’ उसका अनुभव करना; किसी विश्वास की जरूरत नहीं। तो दूसरी बात याद रखनी है कि योग अस्तित्वगत है, अनुभव जन्य है, प्रायोगिक है। वहाँ किसी विश्वास की अपेक्षा नहीं, किसी निष्ठा की आवश्यकता नहीं। वहाँ केवल साहस चाहिए प्रयोग करने का। लेकिन इसी की तो कमी है।
आप विश्वास तो बड़ी आसानी से कर लेते हो, क्योंकि तब आप रूपांतरित होने वाले नही हो। विश्वास तो ऐसी चीज है, जो ऊपरी तौर पर एक सतही ढ़ंग से तुम से जुड जाती है; उससे तुम्हारा अंतस परिवर्तित नहीं होता तुम किसी रूपांतरण की प्रक्रिया से नहीं गुजर रहे होते। आप ही हो जो अगले दिन ईसाई बन सकते हो। आप सरलता से बदल जाते हो। आप गीता की जगह कुरान या बाइबिल पकड सकते हो। लेकिन वह व्यक्ति, जिसके हाथ में गीता थी और अब जो बाइबिल या कुरान पकड़े हुए है, वह तो ज्यो का त्यो बना रह जाता है। उसने केवल अपने विश्वासो को बदल लिया है।
विश्वास तो कपड़ों की भांति हैं। किसी आधारभूत तत्व का रूपांतरण नहीं होता आप भीतर वही के वही बने रहते हो। जरा हिंदू और मुसलमान की चीर फाड़ कर के देखो, भीतर दोनो एक समान ही है। हिंदू मंदिर जाता है और मुसलमान मंदिर से नफरत करता है। मुसलमान मस्जिद जाता है और हिन्दू मस्जिद से नफरत करता है। लेकिन भीतर दोनो एक जैसे ही आदमी हैं।
विश्वास आसान है क्योंकि उस में आपको वास्तव में कुछ करना नहीं पड़ता। वह तो एक छिछलासा पहरावा है, सज्जा है; जिस क्षण चाहो उसे अलग करके रख सकते हो। योग विश्वास नहीं है। इसलिए यह कठिन है, दुष्कर है और कई बार तो लगता है कि बिलकुल असंभव है। योग एक अस्तित्वगत प्रयोग है। तुम किसी विश्वास के द्वारा सत्य को नहीं पाओगे, बल्‍कि अपने ही अनुभव द्वारा पाओगे अपने ही बोध द्वारा उसे उपलब्ध करोगे। और इसका अर्थ हुआ कि तुम्हें आमूल स्‍वप्‍न से रूपांतरित होना होगा। आपका दृष्टिकोण, आपके जीने का ढंग, आपका मन, आपके चित्त का पूरा ढांचा—यह सब जैसा है उसे चकनाचूर कर देना होगा। कुछ नये का सृजन करना होगा। उसी नवतत्व के साथ आप यथार्थ के सम्पर्क मे आ सकोगे।
योग दर्शनशास्त्र नहीं है। योग धर्म नहीं है। योग दर्शनशास्र नहीं हैl यह कोई ऐसी बात नहीं जिसके बारे में आप कुछ विचार करो। यह कुछ ऐसा है जैसा कि तुम्हें होना होगा। केवल सोचने—विचारने से कुछ नहीं होगा। विचार तो तुम्हारे मस्तिष्क में चलता रहता है, यह आपके अस्तित्व की जड़ों में कहीं गहरे नहीं होता। विचार आपके समग्रता नहीं है। यह तो मात्र एक हिस्सा है, एक कामचलाऊ हिस्सा; और इसे प्रशिक्षित किया जा सकता है। आप तर्कपूर्ण ढंग से विवाद कर सकते हो, युक्‍तिपूर्ण विचार कर सकते हो, लेकिन आपका हृदय तो वैसा का वैसा ही बना रहेगा। आपका हृदय गहनतम केंद्र है, सिर तो उसकी शाखा मात्र है। तुम मस्तिष्क के बिना तो हो सकते हो, लेकिन हृदय के बिना नहीं हो सकते।आपका मन आधारभूत तत्व नहीं है।
योग आपके समग्र अस्तित्व से, आपके जड़ों से संबंधित है। वह दार्शनिक नहीं है। इसलिए पतंजलि के साथ हम चिंतन—मनन नहीं करेंगे। पतंजलि के साथ तो हम जीवन के और उसके रूपांतरण के परम नियमों को जानने का प्रयत्‍न करेंगे। पुराने की मृत्यु और सर्वथा नये के जन्म के नियमों को और अंतस की एक नव लयबद्धता की कीमिया को जानने का प्रयत्न हम करेंगे। इसलिए मैं योग को एक विज्ञान कहता हूँ l

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