विश्व पर्यावरण दिवस-2026 के अवसर पर वक्ताओं ने पर्यावरण संरक्षण पर रखे महत्वपूर्ण विचार, परिसर में किया गया वृक्षारोपण
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के विश्वविद्यालय भूगोल विभाग एवं स्नातकोत्तर एनएसएस इकाई के संयुक्त तत्त्वावधान में ‘विश्व पर्यावरण दिवस-2026’ के अवसर पर “वृक्षारोपण एवं संगोष्ठी” कार्यक्रम का आयोजन पीजी भूगोल विभाग में किया गया, जिसमें भूगोल विभाग की प्रभारी अध्यक्षा डॉ रश्मि शिखा- अध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान के संकायाध्यक्ष प्रो ध्रुव कुमार- मुख्य अतिथि, विश्वविद्यालय के एनएसएस समन्वयक डॉ आर एन चौरसिया- मुख्य वक्ता, भूगोल-प्राध्यापक डॉ मनु शर्मा- स्वागत कर्ता, डॉ सुनील कुमार- धन्यवाद कर्ता तथा छात्रा सुरभि कुमारी- संचालन कर्ता सहित 50 से अधिक शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित थे। अतिथियों का स्वागत पाग, चादर, गमला-पौधा एवं पुष्पगुच्छ से किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ अतिथियों द्वारा पौधारोपण से किया गया, जबकि समापन राष्ट्रगान से हुआ है।
प्रो ध्रुव कुमार ने कहा कि मानव की सभी ज़रूरतें प्राकृतिक संसाधनों से पूरी होती है। जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि एवं प्राकृतिक संसाधनों के शोषण एवं दुरुपयोग के कारण वातावरण असंतुलित हो रहा है। पर्यावरण प्रदूषण के कारण ही ‘ग्लोबल वार्मिंग’, ‘ग्रीन हाउस प्रभाव’, ‘जलवायु परिवर्तन’ एवं वायु-जल- ध्वनि-भूमि आदि में प्रदूषण तथा ‘मिट्टी की उर्वरा शक्ति में गिरावट’ होती जा रही है। डॉ आर एन चौरसिया ने कहा कि मानवीय स्वार्थ, लालच, बढ़ती भौतिकतावाद एवं आराम तलबी जीवन शैली के कारण पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। प्रकृति समय-समय पर हमें भूकंप, अनावृष्टि, अतिवृष्टि, बाढ़ आदि के रूप में चेतावनी देती रही है। यदि आज हम नहीं सतर्क हुए तो प्रकृति हमें माफ नहीं करेगी तथा अगली पीढ़ी का जीवन यापन मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने आह्वान किया कि हरित एवं स्वच्छ भारत के निर्माण में युवा सिर्फ साक्षी नहीं, बल्कि सारथी बने, ताकि विकसित भारत-निर्माण का सपना पूरा हो सके।
अध्यक्षीय संबोधन में डॉ रश्मि शिखा ने कहा कि भारतीय परंपरा प्रकृति के साथ मानव का एक टिकाऊ एवं संतुलित संबंध स्थापित करने की प्रेरणा देती है। धरती, पेड़-पौधे, वायु, जल स्रोत, अग्नि, सूर्य-चंद्रमा, पशु-पक्षी, जलवायु आदि प्राकृतिक तत्त्व हमारी सभ्यता, संस्कृति और जीवन दर्शन के अभिन्न अंग रहे हैं। कहा कि अधिकांश हिन्दू देवी- देवताओं को किसी ने किसी पशु या पक्षी के साथ दर्शाया गया है जो मानव और प्रकृति के गहरे संबंध को व्यक्त करता है। स्वागत करते हुए डॉ मनु राज शर्मा ने कहा कि पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता हमारी परंपरा और जीवन पद्धति का अभिन्न हिस्सा रही है जो हमारी धार्मिक गतिविधियों, रीति- रिवाजों एवं दैनिक जीवन के व्यवहारों में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। भारतीय संस्कृति धरती को केवल भौतिक संसाधन नहीं मानती, बल्कि उसे मां के रूप में भी पूजता है। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डॉ सुनील कुमार ने कहा कि प्राचीन काल से ही मानव जीवन और प्रकृति को एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ माना गया है। अनेक पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों को धार्मिक आस्था से जोड़कर संरक्षण प्रदान किया जा रहा है। तुलसी, पीपल, बरगद, नीम, केला, आंमला, आम आदि वृक्षों को पूजनीय माना गया है।





















































