धन्नाराम को अभी-अभी तो गुलाबों से गहरी प्रीत हुई थी और अभी-अभी उसके जाने वक्त आ गया । दैव यह कैसा निर्दयतापूर्वक व्यवहार किया तूने धन्नाराम स्वप्न में बड़बड़ा उठे । बड़ी शिद्दत से चाहा था। उसके लिए कितने खून पसीने बहाए । रात को रात न समझा उसे ही खोजता रहा । वैसे तो मैं मोम हृदय था। मुझमें भी दिल बसता है तभी तो गुलाबों उस दिल में बसती है, लेकिन उसकी चाहत ने मुझे निर्दयी बना दिया । उसकी खातिर कितनों की मैंने जान ले ली ।
खाना-पीना,घर-परिवार, बाल-बच्चे, रिश्तेदार-नात सबका त्याग कर दिया । एक उसकी खातिर और वह भी यूँ बेवफ़ा निकली । तभी कोई आवाज धन्नाराम के कानों में सुनाई पड़ी । बेटा यह दुनिया माया- मोह से भरी है तू इससे जितना दूर रहेगा सुखी रहेगा । वो पंक्ति सुनी है न ‘ साई इतना दीजिए जामे कुटुंब समाय’ फिर काहे का दुख करते हो । यहाँ की चीज यहीं छूट जाती है । धन्नाराम स्वप्न में ही चौक कर देखे तो सामने प्रभु खड़े थे जो उन्हें यह सब समझा रहे थे ।
धन्नाराम हाथ जोड़ कर प्रभु मुझे मेरी गुलाबों से दूर करने वाला और कोई नहीं मेरा और मेरे जैसे तमाम धन्नासेठों का एक ही इस धरती पर दुश्मन है उसे आप बस उठा लें । प्रभु शांत मन से पूछे कौन वत्स नाम बताओ ? धन्नाराम का हर्ष से चेहरा खिल गया और बोल उठे ‘जय हो प्रभु आपकी जय हो ‘। वही प्रभु उसका नाम नरेन्द्र मोदी है । हम सेठों का दुश्मन रातोंरात अभियान के तहत नोट बंदी करता है । इससे पहले करोड़ों का नुकसान झेल चुके हैं हम सब.। और …..और….और…अब जब गुलाबों को अपनाया तो फिर बीच में विलेन की तरह एंट्री कर दिया । उसका नाश कर दो प्रभु । उसे सीधे उठा लो ।
प्रभु बोले बेटा किसीका हक क्यों मारते हो ? इतना जमा क्यों करते हो ? धन्नाराम प्रभु बड़े नोट से प्रेम करना कहाँ गलत है,’ धरती अपनी धन अपना’ है । आप तो बस मेरा काम कर दें । प्रभु मुस्कुराए और अंतर्ध्यान हो गए ।
धन्नाराम को लगा प्रभु उसकी सुन लिए । अब वह जल्द ही नया समाचार सुनेगा । तीन दिन गुलाबो को गद्दे की तरह बिछाकर मधुर स्वप्न देखता रहे । रात- रात भर सोया नहीं । चौथें दिन की रात बारह बजे समाचार में सुना कि इस समय के बाद से गुलाबी दो हजार के नोट पूरी तरह से बंद कर दिए गए । धन्नाराम यह समाचार सुनते से आवाक रह गए और जोर-जोर से चिल्लाने लगे प्रभु तूने भी मुझ से छल किया है, मैं तुम्हें माफ नहीं करूँगा और दहाड़े मार कर रोने लगे इसी बीच धन्नाराम की धड़कने जाने कब रूक गईं । पूरा परिवार शोक में डूब गया ।भोर होते-होते पड़ोसी भी दौड़े आए । किसी ने कहा कफन के साथ ही इन सारे नोटों को भी बाँध दो अब इनका क्या काम । तो किसी ने कहा हाय राम दोनों की साँसे एक साथ निकलीं । परिवारवालों ने धन्नाराम को उनकी गुलाबों के साथ शमशान में फूँक कर आ गए ।
डा. सुनीता सिंह ‘सुधा’
वाराणसी




















































