अमरदीप नारायण प्रसाद
भारत में अभी हम जिस किस्म और जिस दर्जे की बेरोजगारी देख रहे हैं। वह एक जन-आंदोलन को जन्म दे सकती है। हकीकत में बेरोजगारी के मुद्दे पर देश भर में एक बड़ा आंदोलन जैसे फूट पड़ने को तैयार बैठा है। यह आंदोलन जंगल की आग की तरह फफैलेग। हाँ, हमें अभी इतना भर नहीं पता कि जंगल की आग को भड़काने वाली चिनगारी कहाँ,कब और कब सुलगेगी। भारत में जब से बेरोजगारी की गिनती शुरु हुई है। नजर आया है कि बेरोजगारी बड़े पैमाने पर मौजूद है और इसका ज्यादातर रुप अर्ध-बेरोजगारी का रहा है। लेकिन इस मसले को नहीं उठाया जा सका क्योंकि राजनीतिक मोर्चे पर इसे अहमियत नहीं दी गई। अन्य देशों के विपरीत भारत में बेरोजगारी को लेकर ना कोई आंदोलन चला और ना ही कोई सामाजिक उद्वेलन ही देखने में आया। लेकिन अब देश में बेरोजगारों की इतनी बड़ी तादाद मौजूद है कि बेरोजगारी के मसले पर बड़ा जन-आंदोलन छेड़ा जा सकता है। बेरोजगारी के बदली हुई तस्वीर को देखें तो नजर आयेगा कि अब शहरों में पढ़े-लिखे और मुखर ऐसे बेरोजगार नौजवानों की इतनी संख्या हो चली है कि उसे ढंककर नहीं चला जा सकता। आज ऐसे समूह मौजूद हैं जो रोजगार के मसले पर देशव्यापी आंदोलन की अगुवाई कर सकते हैं। चुनौती एक सकारात्मक एजेंडे के साथ आगे आने और बेरोजगारों को एकजुट करके एक ऐसा अभियान चलाने की है जो चालू आर्थिक समझ की रुढ़ियों पर पुनर्विचार के लिए बाध्य कर सके।
बेरोजगारी इस देश की विकट समस्या हमेशा से रही है लेकिन वर्तमान सरकार की कुनीतियों की वज़ह से और विकराल होती जा रही है। हालत इतने ख़राब हैं कि सही आंकड़े तक प्रस्तुत नहीं हो पा रहे हैं। फ़र्जी आंकड़े दिखा कर कागजों पर बेरोजगारी कम हो रही हैं। जिसका ज़मीनी हक़ीक़त से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। रोजगार पंजीयन कार्यालयों ने तो अब बेरोजगारों का पंजीयन तक बंद कर दिया है क्योंकि उस पंजीयन से क्या फ़ायदा? जब कोई नौकरियाँ देने वाला हीं न हो। अब देखिए पहले रेलवे की कितनी भर्तियाँ आती थी। उन भर्तियों के द्वारा खासकर बीमारू राज्यों के बहुत सारे युवा चुनकर जाते थे। अब जब से भाजपा की सरकार आयी है, रेलवे के अधिकांश कार्यों को एक-एक कर निजी हाथों में सौंपा जा रहा है, नतीजा भर्तियाँ कम होती जा रही हैं। जैसे कि पहले स्टेशनों पर साफ़-सफाई हेतु स्वीपर बहाल होते थे, अब वो काम निजी कंपनियाँ को दे दिया गया है। निजी कंपनियाँ हीं रख-रखाव करेंगी। निजी कंपनियों ने पैसा ख़र्च कर टेंडर हासिल किया है, फ़िर उसे मुनाफ़ा भी कमाना है, फिर वो कैसा काम करेगी, खुद सोचें। जहाँ 5 आदमी से काम होना चाहिए वहाँ पर एक को रखा है और वो भी बहुत कम वेतन पर लगेंगे, जहाँ 5 लिटर क्लीनर खर्च होता था वहाँ 2 लीटर होने लगा। अब उस विभाग की भर्तियाँ भी लगभग खत्म हो गयी। बाकी विभाग का भी वही हाल है, एक लम्बा अरसा बीत गया जब ग्रुप बी, सी की भी वेकैंसी आयी हो।
रेलवे के बाद अन्य विभाग का भी वही हाल है, चाहे एसएससी हो या अन्य विभाग। 2013 के बाद से भर्तियाँ साल दर साल कम होती चली गयी। लेकिन सरकार को इस से मतलब कहाँ, उन्हें न तो बेरोजगार युवाओं का दर्द दिखता है और न ग़रीबी की दलदल में फंसे करोड़ों लोग। बस उनमें फ़र्जी आँकड़े दिखा-दिखा कर पीठ थपथपाने की महारथ दिखती है। सीएमआईई के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण भारत के बजाय शहरी क्षेत्रों में ज्यादा बेरोजगारी पनपी है। पहली बात तो यह कि किसी आधिकारिक या गैर-आधिकारिक आकलन में जो तादाद बतायी जा रही है, बेरोजगारों की संख्या उससे कहीं ज्यादा है । सीएमआइई के आकलन के मुताबिक साल 2022 के अगस्त माह में बेरोजगारी की दर 8.3 प्रतिशत थी। इसका मतलब हुआ बेरोजगारों की संख्या का 3.5 करोड़ होना जो कि एक बड़ी तादाद है। लेकिन यह देश की वोट देने योग्य उम्र को पहुंचती आबादी से 4 प्रतिशत कम है। सरकारी आंकड़ों में भी कोरोना-काल से पहले के दौर की बेरोजगारी दर 7.8 प्रतिशत बतायी गई है जो भारत में आम तौर पर प्रचलित बेरोजगारी दर से दोगुनी से ज्यादा है। लेकिन इस संख्या को पक्की तादाद मानकर ना चलें क्योंकि इसमें उन्हीं लोगों की गिनती की गई है जो काम करना चाह रहे हैं। काम खोजने के उद्यम कर रहे हैं लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिल रही। अगर आप बेरोजगारी दर की गिनती का कहीं ज्यादा सीधा-सरल रास्ता और आम समझ वाली परिभाषा अपनायें (सीएमआइई ने इसे ग्रेटर अनएप्लायमेंट रेट यानि वृहत्तर बेरोजगारी दर का नाम दिया है) और बेरोजगारों की श्रेणी में उन लोगों को रखें जो काम करना चाहते हैं, लेकिन नौकरी नहीं मिल रही तो फिर ऐसे लोगों की तादाद सीएमआइई के आंकड़ों के अनुसार इस साल के अगस्त माह में 13.8 प्रतिशत यानि 6.1 करोड़ थी। हम ऐसे लोगों में उनकी गिनती भी कर सकते हैं जो काम करने के आयु-वर्ग में हैं, काम करने के लायक हैं लेकिन ये नहीं कहते कि वे नौकरी करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें नौकरी पाने के हालत नजर नहीं आ रहे। अगर वैश्विक मानकों को सामने रखकर देखें तो हमारे देश की आबादी में कामगार लोगों की संख्या 63 करोड़ होनी चाहिए लेकिन अभी देश में कामगार आबादी की तादाद 39 करोड़ ही है। जाहिर है, फिर आंकड़े में अन्तर 24 करोड़ लोगों का है जिसे वास्तव में बेरोजगारों की छिपी संख्या माना जा सकता है। लेकिन इस बड़ी तादाद को राजनीति के दायरे में क्यों लाना। अभी हम अपने मौजूदा आकलन यानि 6.1 करोड़ लोगों की तादाद को ही ठीक मानकर चलें जो बेरोजगार हैं। और ये कहते भी हैं कि हाँ हम बेरोजगार हैं ।
अचंभे की बात तो यह है कि जो हरियाणा कभी “औद्योगिक हब” कहा जाता था, वो आज राज्यों की श्रेणी में “बेरोजगारी में शीर्ष” पर चला गया है, जिसकी बेरोजगारी दर 35.1% थी। जबकि 28% के साथ राजस्थान दूसरे और 27.3% के साथ दिल्ली तीसरे और 25.7% के साथ गोवा चौथे स्थान पर था। आलम ये है कि हर साल एक करोड़ नये बेरोजगार युवाओं की फ़ौज खड़ी हो रही है। ऐसे में रोजगार देने वाले संस्थानों को कॉरपोरेट के हाथों निजीकरण के नाम पर बेचना कहाँ तक जायज़ है।
विडंबना देखिए कि सरकार के पास बेरोजगारी कम करने के लिये वैसा हीं उपाय है, जैसा “पेट्रोलियम मंत्री” की बढ़ते पेट्रोल के दाम पर बेतुकी दलीलें हैं। लेकिन अफ़सोस फ़र्क़ किसे पड़ता है, किसी को नहीं। जब आवाम को बढ़ती बेरोजगारी से कोई फ़र्क़ हीं न पड़ता फ़िर सोए हुए सत्ताधीशों को भला क्या फ़र्क़ पड़ेगा?”प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी” ने 2015 में कभी जेटली जी के 5-6 पीएसयूएस को छोड़कर बाकी सभी के “निजीकरण” के प्रस्ताव को यह कह कर ख़ारिज कर दिया था कि इस से सरकारी योजनाओं का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन ठीक से नहीं हो पाएगा। उन्ही मोदी जी का 2021 आते-आते ह्रदय परिवर्तन हो गया और गलत अर्थनीतियों की वज़ह से लकवाग्रस्त हुई अर्थव्यवस्था को बचाने के लिये “आत्मनिर्भर” बनाने के नाम पर आज सम्पत्तियों को औने-पौने दाम में बेचने की होड़ मची है। लेकिन इससे भला होगा किसका? कॉरपोरेट का या आम आदमी का या बेरोजगार युवाओं का जो इन संस्थानों में नौकरी पाने के लिये कल कड़ी मेहनत करते थे? अब समय आ गया है कि राजस्व उपार्जन के नये स्रोंतों पर विचार हो न कि आसान दिख रही विनिवेशीकरण के द्वारा धन उगाही की योजनाओं पर हीं केवल आश्रित हों। बाजार में जब तक माँग नहीं बढ़ेगी, तब तक प्रोडक्शन नही बढ़ेगा, प्रोडक्शन नहीं बढ़ेगा तो माँग ज्यादा नहीं मिलेगा, माँग नहीं मिलेगा तो फैक्ट्रियाँ कम चलेंगी, फैक्ट्रियाँ कम चलेंगी तो मजदूर कम लगेगा, मजदूर कम लगेगा तो रोजगार के अवसर घटेंगे मतलब बेरोजगारी बढ़ेगी ही। बेरोजगारी बढ़ेगी तो बाजार से क्रय कम होंगे, अभी ठीक वही हो रहा है और एक बड़ा वर्ग जिसे “मध्यमवर्ग” कहते हैं उसमें से जो संगठित क्षेत्र में है, अधिकांश सरकारी या सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यरत है, अगर उसे हीं सरकार बेचेगी तो परिणाम और ज्यादा भयंकर होंगे। भले ही वो शुरुआत में न दिखे लेकिन दूरगामी प्रभाव बेहद नुकसानदेह होंगे।
इसलिए सरकार को निजीकरण की नीति पर दुबारा पुनर्विचार करनी चाहिए। अमेरिका इस का ताजा उदाहरण है, जहाँ के नए राष्ट्रपति ने सार्वजनिक उपक्रमों के अति विनिवेशीकरण की पूर्व सरकारों की गलती को स्वीकार किया है। विनिवेशीकरण से न केवल रोजगार क्षय होता अपितु सम्भावनाएँ कम होती हैं, सरकारी नियंत्रण समाप्त होता हैं, टैक्स की चोरी शुरू होती है और कार्पोरेट का बाजार पर एकछत्र नियंत्रण होता है।जिससे ग़रीब और मध्यमवर्गीय लोगों की पहुँच खत्म हो जाती है, एक समानांतर अर्थव्यवस्था प्रचलन में आती है। मुद्रास्फ़ीति की सम्भावनाएँ बढ़ जाती हैं। गरीब दिन ब दिन और गरीब तथा अमीर और अमीर होते चले जाते हैं। उनके बीच की खाई और ज्यादा चौड़ी होती चली जाती है।
सरकार जो 2 करोड़ रोजगार हर साल देने के वायदे के साथ आई थी, उसने 45 साल का बेरोजगारी का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार का वायदा करती रहती है और रोजगार मेला जैसे आडम्बरपूर्ण इवेंट आयोजित करती है, पर सच्चाई यह है कि सरकारी नौकरियां लगातार खत्म की जा रही हैं। विडंबना है कि जो सरकार 8 साल में महज 7.22 लाख नौकरियां दे सकी, वह अब अगले 1 साल में 10 लाख सरकारी नौकरियों का वायदा कर रही है। ऐसे वायदे अतीत में भी जुमले से अधिक नहीं साबित हुए। इस गहराते अंधेरे से निकलने का रास्ता है उम्मीद। हमारे देश के युवाओं को सरकार से यह 'भरोसा' चाहिए कि उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं होगा। यह भरोसा है 'भारत रोजगार संहिता', जिसके लिए हमें सामूहिक रूप से लड़ना होगा। जनसमुदाय के बीच बदलाव की यह उम्मीद पैदा करने के लिए व्यापकतम सम्भव एकता के साथ आज जनान्दोलन की जरूरत है। "भ-रो-सा" को केंद्रित कर व्यापक एकता के लिए साझा संकल्प के साथ संयुक्त प्रयास की जरूरत है।
देश के सामने सबसे बड़ी समस्या बढ़ती बेरोजगारी है इस पर हर व्यक्ति को चिंतन और मनन करना चाहिए आखिर जो लोग बेरोजगार हो रहे है उनके परिवार के लोग अपना जीवन यापन कैसे करेंगे और देश में जो युवा पढ़ लिख कर रोजगार की तलाश कर रहे है उनका भविष्य क्या होगा? सोचने का विषय है यदि आप देश के सम्पन्न परिवार में से है । तो देश के बेरोजगार युवाओं के बारे जरूर सोचे। यही नये भारत का भविष्य है। इनका सहयोग करें । देश हमारा है हमें सोचना होगा कैसे हम सहयोग करें? कैसे अधिकतम रोजगार के अवसर उपलब्ध करवायी जाये? कैसे देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में युवा शक्ति को काम में लें? कैसे सरकार की गलत नीतियों के कारण युवाओं को रोजगार पाने में जो कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है उनका समाधान आसान भाषा में युवाओं के पास कैसे पहुंचाई जाए?




















































