स्वार्थी दुनिया के नाते रिश्ते और निःस्वार्थ ईश्वर पर विशेष,,,

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✍️अपर्णा मिश्रा
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इस इस संसार में जो भी नाते रिश्ते होते हैं वह सभी स्वार्थ के वशीभूत होते हैं।कमाई न करके निठ्ठले घूमने वाले असंस्कारिक को माता पिता रिश्तेदार भी अपना पुत्र व नाते रिश्तेदार अपना नही मानते हैं और रिश्ते तोड़ लेते हैं।यह दुनिया ही स्वार्थ के वशीभूत है और स्वार्थ के सहारे यह दुनिया चल रही है जबकि निःस्वार्थ सेवा को ईश्वरीय कार्य माना गया है। मनुष्य इसी स्वार्थ की पूर्ति में जीवन भर उलझा रहता है और ईश्वर को याद करना भूल जाता है।एक ईश्वर ही ऐसा होता है जो निःस्वार्थ भाव से अपने भक्तों की रक्षा करता है।जो ईश्वरीय कार्य करते हैं उनके संसारिक कार्य ईश्वरीय व्यवस्था से पूरे हो जाते हैं।जिस पर ईश्वर की कृपा दृष्टि हो जाती है वह हर तरह से मालामाल होकर सुदामा जी की तरह निहाल हो जाता है। जो जागृत अवस्था में अपनी हर गतिविधियां ईश्वर को हाजिर नाजिर मानकर उसका नाम लेकर संचालित करता है उसका कोई बालबाँका नही कर सकता है।जो उसके सहारे उसके बताये मार्ग चलता है उसका मार्गदर्शन ईश्वर खुद करता है।जो किसी भी अन्याय उत्पीड़न को बर्दाश्त कर लेता है और उसकी शिकायत थाना पुलिस एसडीएम तहसीलदार से न करके ईश्वर से दीनहीन भाव से परमपिता ईश्वर से करता है उसका न्यायोचित फैसला निश्चित होता है।यह कहावत गलत है कि ईश्वर के यहाँ देर है लेकिन अंधेर नही है असलियत तो यह है कि उसके यहाँ न देर होती है और न ही अंधेर होती है।इमरजेंसी वाले मामले ईश्वर भी इमरजेंसी में ही देखता है और जो मामले इमरजेंसी नहीं होते हैं उन्हें बाद में देखता है।जिस तरह प्रशासन या पुलिस कुछ मामलों में तत्काल कार्यवाही करता है और कुछ मामलों में दो चार घंटे या दो चार दिन बाद कार्यवाही करता है। मनुष्य जीवन में कर्म प्रधान होते हैं और कहा भी गया है कि- कर्म प्रधान विश्व रचि राखा जो जस करै ते तस फल चाखा। मनुष्य के कर्म ही उसे मानव से महामानव तथा देवमानव बना देते हैं और उसके कर्म ही उसे नर से नरपशु एवं नरपिशाच बना देते हैं

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