● लैंगिक आधार पर फर्क करने वाले को जहन्नुम में भी नहीं मिलेगा स्थान:- बीज वक्ता, डॉ. अनीस अहमद
● लैंगिक समानता की दिशा में भारत ने इंग्लैंड से पहले महिलाओं को वोट देने का अधिकार देकर विश्व के सामने पेश किया है नजीर:- विभागाध्यक्ष, प्रो. मुनेश्वर यादव
● शिक्षा व जागरूकता के बल ही लैंगिक असमानता को सौ फीसदी तक किया जा सकता है खत्म:- उप-परीक्षा नियंत्रक, डॉ. मनोज कुमार
रूपेश रॉय की रिपोर्ट
लनामिवि दरभंगा:- विश्वविद्यालय राजनीति विज्ञान विभाग में विभागाध्यक्ष प्रो. मुनेश्वर यादव की अध्यक्षता में अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर “गरिमापूर्ण जीवन और लैंगिक न्याय” विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
बतौर मुख्य अतिथि मिथिला विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति महोदय प्रो. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि आज हम सब यहाँ राजनीति विज्ञान विभाग में अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के मौके पर संगोष्ठी में एकत्रित हुए हैं। संगोष्ठी का विषय “गरिमापूर्ण जीवन और लैंगिक न्याय” है। आदिकाल से लेकर आधुनिक काल के इस 21 वीं सदी के तीसरे दशक में यह ज्वलंत विषय है। गरिमापूर्ण जीवन का मतलब ही यही है कि देश के हर नागरिक वजीर से लेकर आम नागरिक तक सबको गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार है। मानव सभ्यता का जैसे-जैसे विकास हुआ। मानव अपने अधिकार के लिये सजग होते गये। तमाम सुविधाओं के बावजूद राजतंत्र में नागरिकों की आवाजों को दबा दिया जाता था। राजतंत्र में शासन पद्धति सामान्यतया दमनकारी होती थी। इसीलिए आम नागरिकों को राजा के अधीन रहना पड़ता था। वो अपने मन से कुछ नहीं कर सकते थे भले उनका आवाज जायज ही क्यों न हो। इसी बीच जातीयता भी प्रबल होती गयी। जाति के आधार पर लोगों को सम्मान मिलने लगा। यही सब कारण था कि मानव सभ्यता के विकास के क्रम में दुनिया में लोकतंत्र की आवाज बुलंद होने लगी। जिसके बाद दुनिया के अधिकांश देशों ने लोकतंत्र व संविधान को अपनाया। लोकतंत्र शासन की अद्यतन व पारदर्शी प्रणाली है। जिसमें हर नागरिक को संविधान के माध्यम से समान अधिकार मिला। समाज के हाशिये पर खड़े वर्गों में भी अगर प्रतिभा है तो उसे आगे बढ़ने का मौका मिला। लेकिन लोकतंत्र में भी एक यक्ष प्रश्न है जिसका समुचित समाधान आजतक नहीं मिल सका है वो है लैंगिक समानता। हम मातृ प्रधान समाज होते हुए भी महिलाओं को वो सब अधिकार देना नहीं चाहते हैं जिसके वो वाजिब हकदार है। आज भी महिलाओं को सामान्यतया खेलने वाले खिलौने के नजर से ही पुरुष देखते हैं। एक विद्वान ने सही ही कहा है कि सामान्यतया महिलाओं की आजादी सूर्योदय से शुरू होती है और सूर्यास्त को खत्म हो जाती है। अगर घर में कोई बीमार है और महिलाएँ अकेली हैं तो उसे घर से बाहर निकलने में डर लगता है क्योंकि पुरुषरुपी हैवान और भेड़ियां पग-पग पर खड़ा मिलता है। अगर देखें तो यह डर का विषय से ज्यादा समाज के लिये चुनौतियों का विषय है। शहरी क्षेत्र में तो महिलाओं के साथ भेदभाव में कमी आयी है लेकिन आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में इससे ग्रस्त है। चाहे वो भेदभाव हो, चाहे बेटे-बेटियों में फर्क हो, चाहे लैंगिक आधार पर गर्भपात हो या बेटे-बेटियों के पढ़ाई का मसला हो या मुखाग्नि देने का मामला। लोग आज भी बेटों को बेटियों के अपेक्षा ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं। इस मिथक को तोड़ना ही होगा और जागरूकता लाना ही होगा कि लिंग के आधार पर समाज में कहीं भी असमानता न हो। हमारी बेटियों को जब भी और जहाँ भी मौका मिला है उन्होंने हर मामले में सिद्ध कर दिखाया है कि वो किसी भी क्षेत्र में बेटों से पीछे नहीं बल्कि एक कदम आगे बढ़कर अपने प्रतिभा का परचम लहरा रही है। अभी चल रहे शिक्षक भर्ती को ही लें तो हमारी बेटियों ने अपने शहर में 70-80 किलोमीटर दूर सुदूर प्रखंड कुशेश्वरस्थान, बिरौल व घनश्यामपुर आदि में अपना ना केवल योगदान दिया है बल्कि प्रतिदिन शहर से सफर की चुनौतियों को तो वहीं दूसरे जिलों व प्रदेशों से भी सैकड़ों किलोमीटर दूर आकर इस चुनौती को स्वीकार किया है। धीरे-धीरे ही सही लेकिन अब ग्रामीण क्षेत्र में भी जागरूकता आ रही है। समाज के सभी जनप्रतिनिधियों व खासकर पंचायत प्रतिनिधियों को चाहिये कि वो गाँव की बेटियों को जागरूक करें और उन्हें ज्यादा से ज्यादा शिक्षा से जोड़ें क्योंकि इतिहास गवाह है कि जिस किसी देश ने महिलाओं के रूप में अपने आधी आबादियों के प्रतिभा को पहचाना है। वो सभी देश विकसित देशों की श्रेणी में शुमार है। अब समय आ गया है कि महिलाओं को चूल्हों-चौकों, घूंघट व घर के चौखट से बाहर निकालकर हर क्षेत्रों में उनके योगदान को स्वीकार करें और जिस दिन यह हो गया यकीनन उस दिन हिंदुस्तान को विश्वगुरु बनने से कोई रोक नहीं सकता है। इसी क्रम में आगे उन्होंने पीएम मोदी और सीएम नीतीश की भी महिला सशक्तिकरण की दिशा में क्रमशः “बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ” व “कन्या उत्थान योजना” के लिये काफी तारीफ करते हुए पिछले कुछ वर्षों में महिला-पुरुष के अनुपात में समानता के अद्यतन आंकड़े को प्रस्तुत किया।
बतौर बीज वक्ता मनोविज्ञान विभाग के वरीय शिक्षक डॉ. अनीस अहमद ने कहा है कि लैंगिक असमानता के लिये काफी हद तक धार्मिक मान्यताएँ भी आड़े आ रही है जबकि धर्म में कहीं भी ऐसी व्याख्या नहीं है। बात जब धार्मिक मान्यताओं की आती है तो लोगों में आज भी अपने-अपने धर्मों के प्रति कट्टरता देखने को मिलती है। कुछ मामलों में देखें तो आज भी लोग धर्म से बाहर रखकर कुछ भी सोच नहीं पाते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्मों में देखें तो लोगों में बेटियों की तुलना में बेटों के प्रति काफी लालसा है। बुढ़ापे की लाठी से लेकर मुखाग्नि बेटा ही देगा इस सोच में आज भी लोग दर्जनों बेटियाँ होने के बावजूद भी बेटे की लालसा में जन्म तब तक दे रहे हैं जबतक कि एक बेटा न हो जाय और इस्लाम में तो परिवार नियोजन मानो किसी को स्वीकार ही नहीं है। एक तरफ यह बढ़ती जनसंख्या का कारण है तो दूसरी ओर जब परिवार में एक कमाने वाला और दर्जनों खाने वाला होगा तो या तो वो गरीबी के करीब पहुंच जायेगा या फिर समाज के मुख्य धारा से कट जायेगा। इसीलिए समाज को जरूरी है कि अब सोच बदलना ही होगा और इस मिथक से खुद को बाहर निकालना ही होगा। एक तरफ हम देवी की पूजा करते हैं, नवरात्रि में कन्या भोजन कराते हैं, अम्मी को खुदा मानते हैं। वहीं दूसरी ओर लैंगिक असमानता करते हैं। लैंगिक आधार पर बेटे-बेटियों में फर्क करने वाले को खुदा कभी नहीं बख्शेंगे। यकीन मानिये ऐसे लोगों के लिये जन्नत तो खैर बहुत दूर जहन्नुम में भी स्थान नहीं मिलेगा। इसीलिए बेटियों के साथ भी गरिमापूर्ण व्यवहार होना चाहिये व लिंग के आधार पर भेदभाव बंद होना चाहिये। आज हर क्षेत्र में बबेटियाँअपने प्रतिभा का परचम लहरा रही है। आगे उन्होंने इस पर विस्तार से प्रकाश डाला।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. मुनेश्वर यादव ने कहा कि सबसे पहले मैं यहाँ बतौर मुख्य अतिथि माननीय कुलपति महोदय सहित सभी आगत अतिथियों का राजनीति विज्ञान विभाग में तहे दिल से स्वागत करता हूँ और इस संगोष्ठी में अभिनंदन भी करता हूँ। मानवाधिकार दिवस के मौके पर आज के संगोष्ठी का विषय है “गरिमापूर्ण जीवन और लैंगिक न्याय”। मैं इस पर प्रकाश डालता हूँ। दुनिया, लैंगिक समानता के लिये कई क्रांतियों का गवाह बना है। ऐसा नहीं है कि यह मुद्दा सिर्फ हिंदुस्तान में व्याप्त है। पश्चिम के देशों में भी सैकड़ों वर्ष पहले काफी संघर्ष देखे हैं। राजनीति विज्ञान विषय के यहाँ उपस्थित छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों को पता है कि पश्चिम के देशों में भी कई नारीवादी कार्यकर्ताओं का उदय हुआ। तमाम झंझावतों व कठिनाइयों का उन्होंने सामना किया है और पुरुष प्रधान समाज के सामने संघर्ष किया है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जिस अंग्रेजों के राज में कभी सूर्यास्त नहीं होता था। वहाँ भी महिलाओं को वोट देने का अधिकार प्राप्त नहीं था। हिंदुस्तान की महिलाएँ तो इस मामले में काफी खुशनसीब हैं कि हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि कई विकसित देशों यहाँ तक कि इंग्लैंड से पहले महिलाओं को वोट देने का अधिकार देकर भारत ने विश्व के सामने ना केवल नजीर पेश कर दिया। अभी हाल ही में आपने देखा है कि पीएम मोदी ने देश के नये संसद भवन के आगाज के मौके पर 18 सितंबर 2023 को नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 पास कर देश की लोकसभा से लेकर राज्यसभा, विभिन्न विधानसभाओं, विधानमंडलों की एक तिहाई सीट महिलाओं के लिये आरक्षित कर दी है। यह आदरणीय प्रधानमंत्री जी के दूरदर्शी सोच का परिचायक भी है। आने वाले वर्षों में इसका फायदा देश को देखने को मिलेगा जब महिलाएँ अपनी आवाज लोकतंत्र के मंदिर देश के संसद में मुखर करते हुए दिखेंगी। समस्याएँ कहाँ नहीं है लेकिन मृत समाज उसे कहा जाता है जहाँ सिर्फ समस्याओं का राग अलापा जाता है। जीवंत समाज वही है जो समस्याओं का समाधान खोज निकालता है। हम यह मानते हैं कि लिंग के आधार पर गरिमापूर्ण जीवन महिलाओं के लिये चुनौतियाँ बनी है लेकिन अब वो दिन ज्यादा दूर नहीं है जब लिंग के आधार पर असमानता इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जायेगा जिसका आगाज वर्षों पहले हो चुका है बस अब उसे सौ फीसदी अंजाम तक पहुंचते देखना बाकी है।
मिथिला विश्वविद्यालय के उप-परीक्षा नियंत्रक(तकनीकी व व्यवसायिक शिक्षा) सह राजनीति विज्ञान विभाग के युवा सहायक प्राध्यापक डॉ. मनोज कुमार ने स्वागत भाषण के क्रम में माननीय कुलपति महोदय सहित सभी आगत अतिथियों का स्वागत व अभिनंदन करते हुए अपने संक्षिप्त संबोधन में कहा कि बात जब मानवाधिकार की उठती है तो दुनिया इसे जब भी अपनाये लेकिन भारत के सनातन संस्कृति को देखें तो मानवाधिकार तो भारतीय संस्कृति में आदिकाल से ही समाहित है। सनातन संस्कृति का मूल मंत्र ही है कि “धर्म का विजय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो और विश्व का कल्याण हो”। फिर विश्व कल्याण की बात करने वाले कैसे लैंगिक आधार पर भेदभाव कर सकते हैं। जिस देश में राम-सीता के जगह सीताराम, श्यान-राधे के जगह राधेश्याम, शंकर-गौड़ी के जगह गौड़ीशंकर, गणेश-लक्ष्मी के जगह लक्ष्मी गणेश का मंत्रोच्चारण होता है। जहाँ शक्ति स्वरूपा को पूजा जाता है। उस देश में लैंगिक असमानता तो मानो एक अभिशाप था। इस दिशा में सरकार का प्रयास सराहनीय है। इंटरनेट भी क्रांति लाने का काम किया है। आज महिलाएँ भी अपना विचार अभिव्यक्त कर रही हैं। लड़कियों को शिक्षा से जोड़ने के लिये केंद्र से लेकर राज्य सरकार तमाम कोशिशें कर रही हैं। इसमें काफी हद तक सफलता भी मिल रही है। शिक्षा व जागरूकता ही ऐसा हथियार है जिसके बदौलत लैंगिक असमानता को सौ फीसदी तक खत्म किया जा सकता है और महिलाओं को गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार दिया जा सकता है।
इस कार्यक्रम में दर्जनों छात्र-छात्रा, शोधार्थी व विभिन्न विभागों के शिक्षकों ने शिरकत की और अपने-अपने महत्वपूर्ण व्याख्यान से छात्र-छात्राओं व शोधार्थियों को रूबरू कराया। मंच संचालन विभाग के वरीय शिक्षक प्रो. मुकुल बिहारी वर्मा ने जबकि धन्यवाद ज्ञापन रघुवीर कुमार रंजन ने किया।




















































