. अमरदीप नारायण प्रसाद .समस्तीपुर :-समाज के रीड होते है साहित्यकार,जिस व्यक्ति में साहित्य के प्रति समर्पण ना हो, मैं समझता हूँ वह बिना सिंग-बिना पूँछ वाले पशु के समान हैं। पिछले दशकों के पन्नों को हम उलटेंगे तो पाएंगे कि किस प्रकार साहित्यकारों ने अपने अहिंसक हथियार कलम की ताकत से शासन का तख्तापलट किया है। चाहे वह लोकतंत्र में हो, अथवा राजतंत्र में।
आज अपने ही जिले के दलसिंहसराय निवासी दूरदर्शी साहित्यकार श्री भोलानाथ मधुकर जी से मिला। पहले अपने मामा श्री दुर्गा प्रसाद सिंह जी से उनका नाम कई बार सुन चुका था। श्री मधुकर जी द्वारा 14 रचनाएँ लिखी जा चुकी है। यह अपने आप में बड़ी कीर्तिमान स्थापित करने वाली बात है। आज भी उन्हीं के द्वारा लिखीत माँ सीता पर आधारित पुस्तक “तेजस्विनी” की 200 प्रतियां पहुंचाने गया था जो पिछले दिनों मैं दिल्ली से प्रिंटिंग करवा कर लाया था। “सादा जीवन, उच्च विचार” के सिद्धांतों पर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं श्री मधुकर जी। उनसे मिलकर मैं काफी प्रभावित हुआ।
सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाबजूद आज भी खपरैल का मकान ही उनका आशियाना है। जीवन में किसी भी तरीके से उन्होंने घुस-पेच नहीं लिया। पन्ना और कलम से इतनी दोस्ती की अपने बिछौना पर साथ लेकर सोते हैं। युवा पीढ़ी जो अपने आपको भारी इंटेलीजेंट समझती है, जो चार पन्ना अपनी कल्पना से नहीं लिख सकते, नशे में धुत रहने पर अपने आपको बेताज बादशाह समझती है, दो नम्बरी से पैसा कमाने को आतुर है। उन्हें एक बार ऐसे संत से अवश्य मिलना चाहिए।




















































