बुद्ध जयंती पर विशेष: सिद्धार्थ से बुद्ध तक की यात्रा

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          - डॉ परमानन्द लाभ
 नेपाल की दक्षिणी सीमा पर रोहिणी नदी के पश्चिमी तट पर अवस्थित कपिलवस्तु के शाक्य राष्ट्र के राजा शुद्धोधन की पत्नी माया देवी के गर्भ से बुद्ध का अवतरण वैशाख पूर्णिमा को हुआ।  ४५ वर्ष की अवस्था में मां माया अपने पिता सुप्रबुद्ध के घर देवरह नगर जाने के मार्ग में राप्ती नदी तट पर लुम्बिनी वन में एक शालवृक्ष की छाया में बुद्ध को जन्म दी,जिसका नाम सिद्धार्थ रखा गया। दुर्भाग्यवश बुद्ध -जन्म के सातवें दिन मां माया स्वर्ग सिधार गई और इनके लालन-पालन का भार इनकी सौतेली मां प्रजावती के कंधे पर आ गया।
    सिद्धार्थ के एकांतप्रियता से चिंतित पिता शुद्धोधन ने मात्र १६ वर्ष की अवस्था में इनकी शादी कोलिय राजा दण्डपाणि की कोमल कन्या यशोधरा, जिसका नाम बिम्बि,गोपा अथवा सुभद्रा, से कर दिया।
   लोकाचार में प्रसिद्ध है कि एक दिन सिद्धार्थ राजभवन से उपवन को पर्यटन के लिए निकले तो उन्हें एक बूढ़ा, एक रोगी, एक मृतक और एक संन्यासी नजर आये। उन्होंने इन सबों की स्थिति की जिज्ञासा साथ चल रहे सारथी छन्दक से किया और संसार से विरक्त हो सन्यास की ओर आकृष्ट हुए।
 अपने २८ म वर्ष की अवस्था में बुद्ध जब घर का परित्याग कर रहे थे, तो एक दासी ने आकर पुत्रोत्पत्ति का समाचार सुनाया। खबर सुनते हीं अनायास उनके मुंह से मुखरित हुआ - "राहुल"। राहुल का शाब्दिक अर्थ विघ्न होता है। आगे उन्होंने यह भी कहा कि यह एक नयी और दुर्भेद्य ग्रंथि है,जिसे उन्हें तोड़ना होगा। और रात में ही अपने इकलौते राहुल और पत्नी यशोधरासहित राज-पाट को छोड़ लोक कल्याण के मार्ग पर अग्रसर हुए। यह घटना ' महाभिनिष्क्रमण ' कहलाती है।
  सिद्धार्थ सर्वप्रथम वैशाली आलारकालाम तपस्वी के पास गए, लेकिन उनके दर्शन से इनकी अंत:पिपासा शांत नहीं हुई, फिर राजगृह प्रसिद्ध दार्शनिक रुद्रक के पास गए, परंतु वहां भी इनकी तृषा अतृप्त हीं रही और तब अपने साथियों के साथ गया के पहाड़ी जंगलों की ओर प्रस्थान किए। रास्ते में राजा बिम्बिसार से दो चार हुए और उसके द्वारा समर्पित राज्य को उन्होंने अस्वीकार कर दिया।वे खड़ी पहाड़ियों को लांघकर महाप्रांतर में उतर गए। वहां निरंजना नदी के किनारे उरुवेला नामक स्थान पर घोर तपस्या में रत हो गए,असह्य पीड़ा को झेलते रहे ।इसी दरम्यान समीप से हीं  नर्तकी की एक टोली एक गीत गाते जा रही थी,जिस गाना का तात्पर्य था कि वीणा के तारों को इतना ढीला न करो कि उससे राग-रागिनी न निकले और इतना न खींचो कि वह टूट जाये।इसका प्रभाव बुद्ध पर पड़ा तथा व्रत-उपवासादि छोड़कर वे मध्यममार्गी बन गए।
  किसी दिन एक बालिका सुजाता के हाथों की बनी खीर को खा लिया, तो साथ के लोग साथ छोड़कर बनारस चले गए। कहा जाता है कि ३३वर्ष की अवस्था में उन्हें एक रात एक पीपल पेड़ के नीचे आत्मज्ञान प्राप्त हुआ, बाद में वही पेड़ 'बोधिवृक्ष' के नाम से विख्यात हुआ। सिद्धार्थ, गौतम बने और इसी दिन से बुद्ध कहलाने लगे तथा अनुयायी बौद्ध कहलाए।
  वहां से बनारस आए, जहां उरुवेला से साथ छोड़कर आये शिष्यों को उन्होंने सर्वप्रथम ज्ञान का उपदेश दिया, जो ' धम्मचक्कपवत्तमसुत' अर्थात् 'धर्मचक्रप्रवर्तन ' कहलाता है।
   ४५ वर्ष की अवस्था तक बुद्ध मगध व आसपास के जनपदों में ज्ञान की गंगा बहाते हुए राजगृह आकर बिम्बिसार को अनुयायी बनाये। बिम्बिसार ने जहां एक ओर बुद्ध को बेनुवन उद्यान भेंट किया, वहीं श्रावस्ती में अनाथ पिंडक महाजन ने जेतवन उद्यान समर्पित किया। इसके बाद वे कपिलवस्तु आये, जहां शाक्जन इनके शिष्य हो गए। पत्नी यशोधरा प्रथम शिष्या बनी।
७० वर्ष की अवस्था में बुद्ध पुनः राजगृह और फिर वैशाली आये, जहां आम्रपाली गणिका का आतिथ्य स्वीकार किये तथा पावा गये। पावा में लुहार चंदुका ने निमंत्रण देकर भोजन में सुअर का मांस परोस दिया। उन्हें शारीरिक और मानसिक पीड़ा हुई,जो दिनानुदिन बढ़ती गई। वहां से कुशीनगर गए और वहीं मल्लों के शालवन में निर्वाण को प्राप्त हुए।
 यही सिद्धार्थ से गौतम और गौतम से बुद्ध बनने की महायात्रा है तथा आज इनका जन्मदिन है। इस अवसर पर हम उन्हें शत-शत बार नमन करते हैं और कामना करते हैं कि उनके बताए बौद्ध -सिद्धांत पर चलकर देश और दुनिया अपने को धन्य कर सकेंगे।
    - डॉ परमानन्द लाभ
स्थापित साहित्यकार, समस्तीपुर।मो ७४८८२०४१०७

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