रामनवमी पर विशेष: राम वनवास

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चंद्रकांता न्यूज़ समस्तीपुर:
— डॉ परमानन्द लाभ
आज बड़ा पवित्र दिन है। मां दुर्गा के नौंवे रुप सिद्धिदात्री की आराधना,समर्थ रामदास की जयंती और भगवान श्रीराम का आविर्भाव दिवस है।
लोकमत में मान्यता के साथ -साथ शास्त्र – सम्मत सच है कि आज के ही दिन सूर्यवंश में उत्पन्न सत्यवादी हरिश्चंद्र के ३१वीं पीढ़ी में हुए अयोध्या नरेश दशरथ के यहां उनकी तीन राशियों में श्रेष्ठ कौशल्या से भगवान श्रीराम आविर्भूत हुए थे।
समस्त चक्षुधारियों ने जाना था कि विराट् विप्लव के सूत्रधार का अवतरण हो चुका है। गोस्वामीजी लिखते हैं –
‘गुप्त रुप अवतरेउ प्रभु ,
गए जान सब कोई।’
रानी कैकेयी ने विश्व मानवता की उलझती जटिल समस्याओं का एक नायाब हल निकाला – ‘ राम वनवास ‘।
एक दिन राजा दशरथ ने अपने बड़े बेटे राम को राजगद्दी पर विराजमान कराने का मन बनाया। लेकिन, विधि को यह मंजूर नहीं था।
देवताओं ने सरस्वती को कैकेयी की चेरी मंथरा की जिह्वा पर बैठा कर उसकी मति फेर दी। मंथरा की सलाह पर कैकेयी महाराज दशरथ से अपने पुत्र भरत के लिए राज्य और राम के लिए चौदह साल वनवास की मांग कर डालती है।
अब प्रश्न उठता है कि कैकेयी ने चौदह सालों के लिए ही राम का वनवास क्यों मांगा और फिर तपस्वी वेष रहने की शर्तें क्यों लगा दी?
रावण की आयु में मात्र चौदह वर्ष ही शेष रह गए थे। दूसरी बात, मुनि और तपस्वियों पर ही रावण अथवा राक्षसों का आक्रमण हुआ करता था।
लंकेश्वर रावण ने अपनी बहन सूर्पनखा को दण्डकारण्य का राज्य दे रखा था और उसके साथ अपने दो राक्षसों खर और दूषण को चौदह हजार सुभट – राक्षसों का सेना नायक बनाकर भेज रखा था। नैमिषारण्य में मारीच और सुबाहु को भेज रखा था।
दो विरोधी संस्कृतियां आपस में टकरायीं और अंत में वैदिक आदर्शों की पूंजीभूत -रश्मियां विकीर्ण हुईं।
कहने का तात्पर्य यह है कि विश्व -कल्याण के लिए, अमित शांति के लिए, धर्म की स्थापना के लिए, लोक मंगल के लिए हीं राम का वनवास हुआ।
इसमें कैकेयी का ” मैं” और “मेरा” का स्वार्थ थोड़ा भी नहीं था। राम के राज्याभिषेक से एक ओर जहां ‘जग मंगल भल काजु ‘ का स्वर गूंज उठा था, वहीं दूसरे तरफ देव लोक में भयानक पीड़ा होने लगी थी।
इस तरह राम वनवास देव -प्रेरणा और विधि केनिदेश पर ही हुआ था। महारानी कैकेयी तो एकमात्र माध्यम थी। इसीलिए कैकेई निंदनीया नहीं,वंदनीयां हैं। यदि कैकेई अपयश से भाग जाती, कलंक का घूंट न पी होती; तो शायद राम पुरुषोत्तम के रुप में आज पूजित न होते।
– समस्तीपुर,मो ७४८८२०४१०७

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