एक दीवार चार भाग लघुकथा

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डा सुनीता सिंह सुधा
मां बहुत देर से आंगन में सुबक रही थी । उसके सुबकने की आवाज सभीके के कानों में जा रही थी पर किसीको झकझोर नहीं रही थी । जिस आंगन में मां की साड़ी धूप में सुखा करती थी और हम चारों भाई बहन उस साड़ी की ओट में छुपा करते थे । एक दूसरे को ठप्पा-ठप्पा कह कर हंसते खिलखिलाते थे आज उसी जगह एक दीवार खड़ी की जा रही थी ।
जिस कांस की थाली और गिलास में हम खाने को लड़ते थे । मां एक साथ दो दो को एक थाली में बैठा देती थी और हम बड़े चाव से साथ खाना खाते । खाना खाने में होड़ लग जाती जो जल्दी जल्दी खा लेता वह विजयी होता । हम एक दूसरे का बचा खुचा और जूठा भी बड़े चाव से अमृत समझकर खा लेते । आज उन्हीं बर्तनों का बंटवारा हो रहा था ।
जिन खेतों की पगडंडियों पर हम नंगें पांव दौड़ा करते थे आज उन्हीं खेतों को कागज पर हस्ताक्षर करके कब्ज़ा लिया जा रहा था ।
पिता जी पहले ही रेखा खींच दिए थे । माता-पिता को छोड़ कर तुम लोग अपने-अपने हिस्से का दुख-सुख, मान-अपमान,जमीन,बाम,आंगन सबकुछ बांट लो । मां का हृदय टूक-टूक हो रहा था लेकिन पिता तो पिता थे धैर्य की मूर्ति बने चुपचाप सबकुछ मानो जीते जी बांट देना चाह रहे थे । तीन घंटे के कोहराम के बाद सब कुछ बंट गया। आंगन में एक दीवार ने चार हिस्सों में घर को बांट दिया। साथ ही सभीके हृदय भी बंट गए । नफरतें बंटीं,कलेश बंटा, अपमान बटा, अपनी-अपनी सामाजिकता बंटी ।
गांव में बंटवारे के शोर की समाप्ति हुई लोग अपने-अपने घर गए । पिता जी मां को लेकर कौन-सी दिशा में कहां गए किसी को पता न चला । जाते-जाते यही बुदबुदा रहे थे हम संपत्ति नहीं हम नहीं बंटेगे । हमें कोई दीवार बाट नहीं सकती ।

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