बुद्ध-जयंती पर विशेष: भगवान बुद्ध

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— डॉ परमानन्द लाभ
भगवान बुद्ध का अवतरण आज से लगभग ढाई हजार साल पूर्व वैशाखी पूर्णिमा के दिन नेपाल की तराई कपिलवस्तु नगर के राजा शुद्धोदन की रानी माया के गर्भ से माता के मायके जाने के मार्ग में शालवन में हुआ था। वे जन्म धारण करते हीं तत्क्षण सात डग चले थे। अल्पावस्था में हीं उनकी माता स्वर्ग सिधार गई थी। फिर, उनके पिता ने पुनर्विवाह किया और सौतेली मां का व्यवहार उनके प्रति स्नेहात्मक था। माता ने बालपन में बड़े लाड-प्यार से उनका पालन-पोषण किया तथा बड़े होने पर गुरुवत् उसी प्रतिष्ठा की दृष्टि से उन्हें देखा।
भगवान बुद्ध विवाह कर कुछ समय के लिए गृहस्थ धर्म स्वीकार तो किये, परंतु बाद में सन्यास को धारण किए।
भगवान बुद्ध को वृद्ध, बीमार व मृतक के दर्शन होने पर प्रबल वैराग्य हुआ। शायद सूखी सलाई पर मात्र एक काठी के रगड़ की आवश्यकता थी।
भगवान बुद्ध छ: सालों तक वन में कठोर तपस्या करने के पश्चात जान सके कि इससे अभिष्ट मंजिल की प्राप्ति नहीं हो सकती।
भगवान बुद्ध को गया में एक वट-वृक्ष के तले परम सिद्धि मिली। इसप्रकार इनका आविर्भाव गंगा के उत्तरी पार और अभय सिद्धि गंगा के दक्षिणी पार में हुई।
भगवान बुद्ध ने ध्यान करने तथा पंचशील के पालन करने का उपदेश दिया। उन्होंने बुद्ध, धर्म और संघ के शरण में जाने की बात बताते हुए कहा-
बुद्धं शरणं गच्छामि।
धम्मं शरणं गच्छामि।
संघं शरणं गच्छामि।
भगवान बुद्ध ने डाकू अंगुलिमाल और वेश्या आम्रपाली का उद्धार किया। साथ हीं पैदल घूम-घूम कर देश औ देश के बाहर अपने धर्म का प्रचार किया। मनुष्य मात्र को सद्ज्ञान दिया।
कुछ विद्वानों का कहना है कि भगवान बुद्ध ने वेद और ब्रह्म को अस्वीकार किया तथा भिक्षुओं-भिक्षुणियों की संख्या बढाई। उन्होंने अपने अनुयायियों को मौखिक उपदेश दिया।
बुद्ध की मैत्रीपूर्ण भावना सबों के लिए आदरणीय है। उनका स्पष्ट मानना था कि शांतिपद के जिज्ञासुओं को सहनशील, मधरभाषी और निरहंकारी होना चाहिए। हमारा आचरण कदापि ऐसा नहीं होना चाहिए, जिससे सज्जनों की दृष्टि में हम दोषी हों।सबों के सुख और आनंद की कामना करनी चाहिए। सदैव सबों के प्रति अपने अंदर मैत्री भावना रखनी चाहिए।
भगवान बुद्ध का लोगों के लिए सलाह है कि वे अंदर की ज्योति जलाएं, ब्रह्मचर्य का पालन करें। यही सच्ची सुद्धि है। स्वयं का दमन करने पर ज्योति की प्राप्ति होती है, जो सच्ची आत्मशुद्धि है। समस्त प्राणियों का कल्याण उनकी कामना थी। सभी पदार्थ अनात्म हैं।
इसप्रकार देखा जाता है कि अहिंसावतार व करुणावतार भगवान बुद्ध का अनुभव कहता है कि जीवन है तो दुःख भी उसके साथ लगा हीं रहेगा। दुनिया में दुःख से छुटकारा नहीं मिल सकता, पर उससे ऊपर उठा जा सकता है। इसी निमित्त उन्होंने गया में जिस निर्वान की राह खोजी, उसे जन-जन तक पहुंचाने का काम किया। पंचशील अपनाते हुए आसक्तियों से मुंह मोड़ने और राग-द्वेष से दूर रहने की शिक्षा दी।
भगवान बुद्ध ने दया और करुणा बांटने तथा मध्यम मार्ग अपनाने पर जोड़ दिया। वाणी, आहार, शयन व भोग आदि में संयम बरतने की सलाह दी।
सारत: यह कहा जा सकता है कि उनके ज्ञान अनुभवजन्य और आत्मज्ञान पर आधृत थे। उनका उद्घोष था– “मैने तुम्हें दुःख की प्रकृति उससे मुक्ति की उपाय बताया है और यही ज्ञान निर्वाण को प्राप्त कराता है। ” अतएव, बुद्ध जयंती के अवसर पर हम उनके पावन चरणों में शत-शत प्रणाम अर्पित करते हुए सज्जनों से आग्रह करते हैं कि वे संतुलित रहकर स्वयं सोचें और सदाचारसम्बन्धी निर्णय लें और निर्वाण प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ें।

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