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– डॉ परमानन्द लाभ
अषाढ़-पूर्णिमा।गुरु-पूजन का दिन। इसे लोग “गुरु-पूर्णिमा” और “व्यास-पूर्णिमा” भी कहते हैं। इस दिन संसार भर के लोग अपने-अपने गुरु की पूजा करते हैं।कहा जाता है कि वशिष्ठ पौत्र और शक्ति मुनि के पुत्र पराशर-तनुज व्यास का जन्म इसी दिन एक द्वीप में हुआ था।वे चित्रगुप्तरचित वेद को विभाजित करने वाले, महाभारत,व पुराणों के रचयिता के साथ-साथ ईरान में शास्त्रों का झंडा फहराकर “जगद्गुरु” की उपाधि धारण करने वाले और गुरु के समस्त गुणों को सहेजने वाले पुरुष थे। इन्हीं के जन्मदिन को गुरु-पूजा के रूप में मनाने की परंपरा चल पड़ी।इस अवसर पर मैं भी अपने इष्ट परम गुरु महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज सहित संसार के समस्त गुरुओं के कृपालु चरणों में अपना प्रणाम अर्पित करता हूं।
” साहब”, “सतगुरु”और “साध” तीनों एक ही हैं। ये मेरा कहना नहीं है, पहुंचे हुए संत गरीब साहब का कहा हुआ है –
“साहब से सतगुरु भए, सतगुरु से भए साध।
ये तीनों अंग एक हैं, गति कछु अगम अगाध।।”
और इनकी महिमा अपरम्पार है। कबीर साहब तो इतना तक कहते हैं कि गुरु और परमात्मा एक हीं हैं –
” गुरु साहब करि जानिये, रहिए शब्द समाय।
” मिलै तो दण्डवत वन्दगी,पल-पल ध्यान लगाय।”
फिर,नानक साहब भी ने भी परब्रह्म परमात्मा के रुप में गुरु को प्रणाम किया है –
“गुरुदेव सतिगुरु पारब्रह्म परमेसरु,
गुरुदेव नानक हरि नमसकरा।”
गोस्वामी तुलसीदास की दृष्टि तो संत-भगवंत में कोई फर्क हीं नहीं मानती –
” संत भगवंत अंतर निरंतर नहीं किमपि मति विमल कह दास तुलसी।”
यह तो गुरु -परमात्मा को एक मानने की बात हुई, अनोखी बात तो यह है कि कबीर ने गुरु को परमात्मा से भी बड़ा कह दिया।यथा – “गुरु हैं बड़े गोविंद ते” और क्यों कहा? इसलिए कि “गुरु सुमिरै तो पार।”
कबीर की उपर्युक्त वाणी को तुलसीदास जी ने और परिपुष्ट करते हुए भगवान श्रीराम को वाल्मीकि से सीधा कहलवा दिया – “तुम्हतें अधिक गुरहि जिय जानी।सकल भायं सेवहिं सनमानी।”
हां! केवल कबीर -तुलसी ने हीं नहीं कहा, बल्कि सुन्दरदास जी महाराज यहां तक कहते हैं कि गुरु की महिमा गुरु से विशेष है –
“गुरु की तो महिमा अधिक है गोविंद ते।”
चरणदास जी और उनकी शिष्या सहजोबाई स्पष्ट कहते हैं कि ऐसा संतों के साथ -साथ वेदों और पुराणों का भी कहना है। यथा-
” हरि सेवा कृत सौ बरस, गुरु सेवा पल चार।
तौं भी नहीं बराबरी,वेदन किया विचार।।”
– चरणदास
” परमेसर सूं गुरु बड़े,गावत वेद पुरान।”
– सहजोबाई
और हमारे गुरुदेव महर्षि में हीं की वाणी में आया है –
“नमो नमो सतगुरु नमो,जा सम कोउ न आन।
परम पुरषहू ते अधिक,गावें संत सुजान।”
इस प्रकार देखा गया है कि समस्त सद्शास्त्रों और सद्जनों की दृष्टि में संत सद्गुरु के हीं निराकार स्वरूप हीं परमात्मा हैं और परमात्मा के हीं साकार रुप सन्त सद्गुरु हैं। परमात्मा अव्यक्त रुप में व्यापक हैं और सद्गुरु व्यक्त रुप में सर्वव्यापी हैं। सद्गुरु ब्रह्मा, विष्णु, महेश,हरि,प्रयाग, पंडित, कवि,योगी, मुनि, ऋषि आदि कतिपय नामों से अभिहित किये जाते हैं। केवल नाम से हीं नहीं जाने जाते, इनके गुणों को भी धारण किए होते हैं।
तन्त्रशास्त्र में तो यहां तक कहा गया है कि दान और तप करने से कोई लाभ नहीं है, किंतु जिस पुरुष ने गुरु के चरणों की पूजा की, उसने सम्पूर्ण जगत की पूजा की है। तन्त्रशास्त्र के साथ महाभारत,शंख व कुलार्णव सहित सबों का यही मत है।
अतएव सार रुप में कहा जा सकता है कि शिष्य के लिए गुरु की पूजा परमावश्यक है। रुद्रयामल तंत्र में पार्वती शिव से कहती हैं कि गुरु की भक्ति से बढ़कर और कोई भक्ति नहीं है। बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाईं की भी मान्यता है कि गुरु के बिना जप तप दान व्रत तीर्थ सब व्यर्थ हो जाते हैं। इस प्रकार यह कहना उचित हीं प्रतीत होता है कि सन्त सद्गुरु की प्रसन्नता से असंभव भी संभव हो जाते हैं। ऐसे दयालु गुरु के चरणों पर मैं अपना मस्तक रखता हूं। जय गुरुदेव।
— डॉ परमानन्द लाभ,
उपाध्यक्ष, बिहार प्रदेश मानस प्रचार संघ एवं समस्तीपुर जिला प्रगतिशील लेखक संघ।
मो ७४८८२०४१०७



















































