प्रदीप कुमार नायक
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
थाली और बच्चों की पढ़ाई… बजट कैसे तय करता है सब कुछ? समझिए 1860 से डिजिटल भारत तक का पूरा सफर_l हर साल एक फरवरी को बजट आता है। उससे पहले ही बजट शब्द सुर्खियों में छा जाता है। खूब चर्चा होती है- किस सेक्टर को क्या मिलेगा, किस पर कितना खर्च होगा, क्या सस्ता होगा और क्या महंगा। हाल यह होता है कि हम सबके निजी प्लान भी बजट के हिसाब से तय होने लगते हैं। मैं भी दोस्तों से कह चुकी हूं- ‘संडे को बजट आना है, इसलिए मैं फ्री नहीं हूं।’ शुक्रवार शाम मेरे 11 साल के भतीजे ने मासूमियत से पूछा- मौसी, ये बजट क्या है, कहां से आता है और किस-किसको बांटा जाता है? मैंने बताया कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी 2026 को सुबह 11 बजे संसद में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए केंद्रीय बजट पेश करेंगी। यह आजाद भारत का 93वां बजट होगा। बजट हर साल आता है।
यह सिर्फ आंकड़ों और घोषणाओं का दिन नहीं होता। यह देश की आर्थिक दिशा, सरकार की प्राथमिकताओं और आम लोगों की उम्मीदों का आईना भी है। मेरी बात पूरी होने से पहले उसने पूछा- आप कह रही हैं बजट हर साल आता है, लेकिन आजादी को 15 अगस्त 2026 को 79 साल होंगे, फिर 93वां बजट कैसे? मैंने हंसकर पूछा- और भी सवाल हैं? जवाब मिला- बहुत सारे.. देश का पहला बजट कब आया और पार्लियामेंट में किसने पेश किया? क्या अंग्रेजों के समय भी इंडिया का बजट आता था? बजट क्यों जरूरी है, कैसे बनता है और बजट से हमारा क्या लेना-देना है?
जैसे भारी-भरकम शब्दों का मतलब क्या है. वित्त मंत्रालय की भाषा में बजट के दस्तावेज आखिर होते कौन-कौन से हैं:
ये सवाल सुनकर लगा कि यह जिज्ञासा सिर्फ मेरे भतीजे की नहीं है। बजट के मौसम में ऐसे ही सवाल हर आम नागरिक के मन में उठते हैं। इसलिए बजट से जुड़े सभी सवालों के जवाब हम यहां आसान भाषा में आपको समझाते हैं, पढ़ें …
बजट 2026 बजट क्या है:
बजट सरकार का सालाना हिसाब-किताब होता है, जिसमें जानकारी दी जाती है कि सरकार एक साल में कितना पैसा कमाएगी और किस-किस काम में कितना पैसा खर्च करेगी। आसान शब्दों में बजट देश की आमदनी और खर्च का पूरा प्लान है। संसद में बताया जाता है कि पैसा शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रक्षा-सुरक्षा, खेती-किसानी और जनता से जुड़ी योजनाओं में कैसे बंटेगा।
आजादी के 79 साल होंगे तो बजट 93वां कैसे:
हर साल बजट आता है, यह बात सही है। देश में ऐसा भी हुआ है, जब एक ही साल में दो बजट- अंतरिम बजट (Interim Budget) और पूर्ण बजट (Full Budget) भी पेश हुए हैं।
पहला कारण:
जिस साल लोकसभा चुनाव होने वाले होते हैं, उससे पहले अंतरिम बजट पेश किया जाता है। फिर नई सरकार बनने के बाद उसी साल पूरा बजट आता है।
दूसरा कारण: कुछ सालों में राजनीतिक अथवा आर्थिक परिस्थितियों के कारण अतिरिक्त बजट भी पेश किए गए।
उदाहरण के लिए..:
नवंबर 1956: पूर्व वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णमाचारी ने पहला अतिरिक्त बजट घरेलू-वैश्विक आर्थिक दबाव, बढ़ती महंगाई और घटते विदेशी मुद्रा भंडार से निपटने के लिए पेश किया था।
अगस्त 1965: दूसरा अतिरिक्त बजट भी टी. टी. कृष्णमाचारी ने पेश किया था। इसमें अतिरिक्त राजस्व जुटाने के लिए मध्य-वर्ष कर (Mid-Year Tax) प्रस्ताव लाए थे।
दिसंबर 1971: उस वक्त के वित्त मंत्री वाई. बी. चव्हाण ने रक्षा जरूरतों के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने के उद्देश्य से तीसरा अतिरिक्त बजट पेश किया था।
जुलाई 1974: पूर्ण बजट के महज पांच महीने बाद ही महंगाई पर काबू पाने के लिए नए कर प्रस्तावों के साथ वाई. बी.चव्हाण को अतिरिक्त बजट पेश करना पड़ा था।
यही वजह है कि आजादी को 79 साल होंगे, लेकिन अब तक 92 केंद्रीय बजट पेश किए जा चुके हैं। इनमें से 73 पूर्ण बजट, 15 अंतरिम बजट और 4 अतिरिक्त बजट हैं। कल, यानी 1 फरवरी 2026 को 93वां बजट पेश होगा।
देश के पहले बजट की क्या कहानी है:
15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ भारत- यानी कई रियासतों से मिलकर बना एक नया-नवेला देश, सीमित संसाधन, बंटवारे के गहरे घाव और भविष्य की बड़ी जिम्मेदारियां थी। कुछ सिस्टम पहले से बने थे तो कुछ अपने सिस्टम बनाने बाकी थे। ऐसे में देश का बजट इन सभी हालातों को देखते हुए पेश किया था।आजादी के सिर्फ तीन महीने बाद देश के पहले वित्त मंत्री आर के शनमुखम चेट्टी (R. K. Shanmukham Chetty) ने 26 नवंबर 1947 को शाम 5 बजे पहला बजट पेश किया था। इसमें सरकार ने 171.15 करोड़ रुपये के राजस्व और 197.29 करोड़ रुपये खर्च का अनुमान लगाया था। इस वक्त सरकार बढ़ती महंगाई,औद्योगिक और कृषि उत्पादन में गिरावट को लेकर खासा फिक्रमंद थी। यह अंतरिम बजट था।
शनमुखम चेट्टी ने बजट भाषण की शुरआत में कहा था:
मैं आज आजाद और स्वतंत्र भारत का पहला बजट पेश करने के लिए खड़ा हुआ हूं। यह अवसर ऐतिहासिक है। इस बजट को पेश करना मेरे लिए सौभाग्य की बात है।
क्या अंग्रेजों के समय भी इंडिया का बजट आता था:
हां, अंग्रेजों के शासन में भी भारत का बजट आता था। बजट की परंपरा भारत में ब्रिटिश काल में ही शुरू हुई। साल 1860 में स्कॉटिश अर्थशास्त्री जेम्स विल्सन ने पहला बजट पेश किया और उसी के साथ आयकर की नींव रखी गई। तब बजट भारत के विकास के लिए नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार की जरूरतें पूरी करने और टैक्स वसूली के लिए बनाया जाता था।
बजट कैसे बनता है:
बजट बनाने की प्रक्रिया हर साल करीब छह महीने पहले यानी सितंबर से ही शुरू हो जाती है। आइए बजट बनाने की पूरी प्रक्रिया समझाते हैं..
वित्त मंत्रालय सितंबर में सभी मंत्रालयों, विभागों, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सर्कुलर भेजकर पूछता है- अगले वर्ष के लिए कितने पैसे की जरूरत है।
मंत्रालय/विभाग, राज्य और केंद्र शासित राज्य अपनी कमाई-खर्च और अगले साल के खर्च का अनुमान भेजते हैं। इसको क्रॉस चेक किया जाता है।
वित्त मंत्रालय अक्टूबर-नवंबर में अन्य मंत्रालयों और विभागों के साथ बैठक करता है, जिसमें फंड का वितरण तय किया जाता है।
फिर बजट बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। उसके बाद वित्त मंत्री, वित्त सचिव, राजस्व सचिव और व्यय सचिव की रोजाना बैठक होती है।
बजट बनाने वाली टीम में अलग-अलग सेक्टर के एक्सपर्ट शामिल होते हैं।
बजट टीम को पूरी प्रक्रिया के दौरान प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री और नीति आयोग से लगातार सुझाव मिलते रहते हैं।
वित्त मंत्री बजट बनाने और पेश करने से पहले अर्थशास्त्री, उद्योग, किसान समूह और अन्य विशेषज्ञों से भी सलाह लेता है।
बजट से जुड़ी सारी चीजें फाइनल होने के बाद एक ड्राफ्ट तैयार किया जाता है।
ड्राफ्ट को प्रधानमंत्री व कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद बजट दस्तावेज प्रिंट होता है।
बजट की प्रिंटिंग की शुरुआत हलवा खिलाकर की जाती है।
फिर वित्त मंत्री 1 फरवरी को संसद में बजट पेश करते हैं।
बजट से आम आदमी का क्या लेना-देना है:
कमाई पर असर: बजट तय करता है कि आपकी और मेरी सैलरी पर कितना टैक्स लगेगा या कितना बचेगा।
महंगाई का खेल: दाल, दूध, आटा-चावल, पेट्रोल, गैस, मोबाइल, दवाइयों जैसी चीजें सस्ती होंगी या महंगी, यह बजट से तय होता है।
रोजगार के मौके: सरकार कहां पैसा लगाएगी, कौन-सी योजनाएं शुरू करेगी, उसी से नौकरी और काम के अवसर बनते हैं।
बच्चों की पढ़ाई: स्कूल, कॉलेज, स्कॉलरशिप और एजुकेशन योजनाओं का पैसा बजट से आता है।
इलाज और सेहत: सरकारी अस्पताल, दवाइयां और हेल्थ स्कीम्स बजट पर ही चलती हैं।
सड़क, बिजली, पानी:
आपके शहर-गांव की सड़क, पानी और बिजली का खर्च बजट से तय होता है।
गरीब और मध्यम वर्ग:
सब्सिडी, राशन, पेंशन और सरकारी मदद बजट से मिलती है। यानी कि बजट सरकार का हिसाब-किताब है, लेकिन असर सीधा आपकी और हमारी जेब, नौकरी और जिंदगी पर पड़ता है।
बजट से जुड़े अहम शब्दों का मतलब:
केंद्रीय बजट (Union Budget): वह दस्तावेज, जिसमें सरकार की सालभर की कमाई और खर्च का पूरा हिसाब होता है, जिसे संसद में पेश किया जाता है।
पूंजीगत व्यय:
सड़क, रेलवे, अस्पताल, स्कूल जैसी लंबे समय की संपत्ति बनाने पर होने वाला खर्च।
राजकोषीय घाटा:
जब सरकार की कमाई से ज्यादा खर्च हो जाता है, तो जो कमी रहती है वही राजकोषीय घाटा कहलाती है। यह बताता है कि सरकार को कितना कर्ज लेना पड़ेगा। जैसे: कमाई 100 रुपये, खर्च 120 रुपये ⇒ 20 रुपये का घाटा।
जीडीपी:
एक साल में देश में बनी सारी वस्तुओं और सेवाओं की कुल कीमत, जो देश की आर्थिक ताकत बताती है।
महंगाई:
जब दाल, सब्जी, दूध, पेट्रोल जैसी रोज़मर्रा की चीज़ें महंगी होने लगती हैं, यानी उसी पैसे में कम सामान मिलता है।
प्रत्यक्ष कर:
जो कर आप सीधे सरकार को देते हैं, जैसे आयकर (Income Tax)।
अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax) : जो कर चीजों की कीमत में जुड़ा होता है, जैसे जीएसटी (GST)।
भारत की समेकित निधि (Consolidated Fund of India): सरकार का मुख्य खाता, जिसमें टैक्स और अन्य आय जमा होती है और खर्च यहीं से किया जाता है।
बजट अनुमान:
आगामी वित्त वर्ष में कितनी आय होगी और कितना खर्च होगा, इसका अनुमान।
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बजट से जुड़े सभी प्रमुख दस्तावेज और उनका मतलब?
वार्षिक वित्तीय विवरण:
यह बजट का सबसे अहम दस्तावेज होता है, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 112 के तहत सरकार को पूरे वित्त वर्ष की अनुमानित आय और खर्च का ब्यौरा संसद के सामने रखना होता है। इसे आमतौर पर Budget Statement भी कहा जाता है।
अनुदान की मांगें:
इस प्रस्ताव के जरिये हर मंत्रालय लोकसभा से अपने खर्च की मंजूरी मांगता है। इसमें मंत्रालयों का के तहत आने वाले भी खर्चों का कुल विवरण दिया जाता है।
प्राप्तियों का बजट:
यह सरकार की कमाई का पूरा हिसाब होता है। इसमें इनकम टैक्स, GST, कस्टम ड्यूटी, नॉन-टैक्स रेवेन्यू, कैपिटल रिसीट्स और विदेशी सहायता से होने वाली आय का अनुमान दिया जाता है। साथ ही, पिछले कुछ वर्षों से तुलना (ट्रेंड) भी की जाती है।
व्यय बजट भाग 1:
इसे सरकार के खर्च की बड़ी तस्वीर कहा जा सकता है। इसमें सभी योजनाओं, सब्सिडी और विभागों के लिए तय बजट का विवरण होता है, यानी सरकार कितना और कहां खर्च करेगी।
व्यय बजट भाग 2:
इसमें जानकारी दी जाती है कि सरकार किसी योजना पर पैसा क्यों और कैसे खर्च कर रही है। किन योजनाओं पर खर्च बढ़ा, किन पर घटा और उसके पीछे क्या वजह रही।
वित्त विधेयक:
बजट में प्रस्तावित टैक्स से जुड़े सभी बदलाव इसी में शामिल होते हैं, जैसे- नया टैक्स लगाना, किसी टैक्स को खत्म करना या टैक्स दरों में बदलाव। संसद से पास होने के बाद यही कानून बनता है।
वित्त विधेयक पर ज्ञापन:
यह दस्तावेज टैक्स बदलावों को आसान भाषा में समझाता है। इसमें बताया जाता है कि कौन-सा टैक्स बदलाव क्यों किया गया है और उसका असर किस पर पड़ेगा। आम पाठकों और टैक्सपेयर्स के लिए यह बेहद उपयोगी होता है।
बजट से जुड़ी ये कुछ रोचक बातें भी जान लें:
हलवा सेरेमनी: बजट प्रिंटिंग से पहले वित्त मंत्री हलवा खिलाकर मुंह मीठा कराती हैं। इसके बाद ‘लॉक इन पीरियड’ शुरू हो जाता है।
लॉक इन पीरियड:
बजट बनाने के दौरान टीम को नॉर्थ ब्लाक के बेसमेंट में स्थित प्रिंटिंग प्रेस के अंदर दो हफ्ते रहना होता है। इस वक्त वे न किसी से मिल सकते हैं और न बात कर सकते हैं।
ब्रीफकेस का चलन बंद:
आजादी के पहले से साल 2018 तक बजट को चमड़े के ब्रीफकेस में रखकर संसद में लाया जाता था और फिर पेश किया जाता था।
लाल पोटली:
निर्मला सीतारमण ने 2019 को लाल कपड़े में लिपटे बहीखाता को पेश किया, तब से यही चलन जारी है।
पेपरलेस बजट:
हमेशा से बजट प्रिंट होता था, लेकिन कोविड के समय 2021 से मेड इन इंडिया टैब से पेश किया जाने लगा।
तारीख बदली:
पहले बजट फरवरी के आखिरी दिन- 28 या 29 तारीख को पेश होता था। 2017 से बजट 1 फरवरी को पेश होने लगा।
समय बदला:
ब्रिटिश दौर से लेकर साल 2000 तक बजट शाम 5 बजे पेश होता था। 2001 में पहली बार अटल सरकार ने सुबह 11 बजे पेश किया; तब से सुबह 11 ही पेश होता है।
रेल बजट भी आम बजट का हिस्सा:
पहले रेल बजट और आम बजट अलग-अलग दिन आता था। 2017 से रेलवे का बजट भी आम बजट का ही हिस्सा बन गया।
आइए, बजट से जुड़े ये कुछ खास और जरूरी पहलू ये भी हैं:
1950 में बजट लीक हो गया था। इसके लिए उस वक्त के वित्त मंत्री जॉन मथाई को इस्तीफा देना पड़ा था।
1950 में बजट लीक होने के बाद ही ‘लॉक इन पीरियड’ शुरू हुआ। बजट पेपरलेस हुआ तो यह ‘लॉक इन पीरियड’ भी कम हो गया।
1955 तक बजट अंग्रेजी में पेश होता था। इसके बाद से बजट हिंदी और अंग्रेजी दोनों में छपने लगा।
1977 में हीरूभाई मूलजीभाई पटेल (पूर्व वित्त मंत्री ) ने सबसे छोटा सिर्फ 800 शब्दों का बजट भाषण दिया था।
1991 में उस वक्त के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने सबसे ज्यादा 18,650 शब्दों का बजट भाषण पढ़ा था।
2020 में निर्मला सीतारमण रिकॉर्ड सबसे लंबा बजट 2 घंटा 42 मिनट का दिया था।
प्रधानमंत्री ने भी पेश किया बजट, कब और क्यों?
1958 में बजट से ठीक पहले उस वक्त वित्त मंत्री टीटी कृष्णामाचारी ने इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने बजट पेश किया था।
1970 में मोरारजी देसाई ने वित्त मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। फिर उस वक्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बजट पेश किया था।
1987 में वीपी सिंह ने बजट से पहले पद से इस्तीफा दे दिया तो पीएम रहते राजीव गांधी ने बजट पेश किया था।















































