बुढ़वा होली मनाने की क्या है परंपराएं

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नवादा से अनिल शर्मा की रिपोर्ट
पूरे देश में रंगों का त्योहार होली को मनाने की अलग-अलग परम्पराएं है लेकिन मगध की धरती पर खेली जाने वाली बुढ़वा होली अनोखी है। बुढ़वा होली की खासियत है कि होली के दूसरे दिन भी लोग पूरे उत्साह के साथ इसे मनाते हैं और यह किसी भी मायने में इसकी छटा होली से कम नहीं होती। इस दिन भी लोग पूरे उत्साह के माहौल में एक दूसरे को रंगगुलाल लगाते हैं। झुमटा निकालकर गांव और शहर के मार्गों पर होली के गीत गाते हुए अपनी खुशी का इजहार करते हैं।
बुढ़वा होली पर लोग पूरे दिन रंग और गुलाल में सराबोर रहते हैं। एक दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। बुढ़वा होली की शुरुआत कब और कैसे हुई इसके बारे में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है। ज्यादातर लोग बुढ़वा होली के बारे में मानते हैं कि जमींदारी के समय में मगध के एक नामी गिरामी जमींदार होली के दिन बीमार पड़ गए थे।जमींदार जब दूसरे दिन स्वस्थ हुए तो उनके दरबारियों ने होली फीकी रहने की चर्चा की। जमींदार ने दूसरे दिन भी होली खेलने की घोषणा कर दी। इसके बाद मगध की धरती पर बुढ़वा होली मनाने की परम्परा शुरू हो गई। आज भी नवादा समेत पूरे मगध की धरती पर बुढ़वा होली मनाने की विशिष्ठ परम्परा है।होली के दूसरे दिन नवादा, गया, औरंगाबाद, अरवल, जहानाबाद और उसके आस पास के क्षेत्रों में पूरे उत्साह के साथ बुढ़वा होली मनाई जाती है। बुढ़वा होली के दिन सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर छुट्टी नही रहती है, लेकिन उस दिन भी अघोषित छुट्टी का नजारा रहता है। व्यावसायिक प्रतिष्ठान और आवागमन पूरी तरह से बंद रहते हैं। बुढ़वा होली पहले गांवो तक ही सीमित थी लेकिन अब यह शहरों में मनाई जाने लगी है।
वहीं लोगों का मानना है कि आज के इस बदलते परिवेश में जहां बुजुर्ग उपेक्षित का शिकार हो रहे हैं तो वही बुजुर्गों के सम्मान में बुढ़वा होली मनाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इस दिन बुजुर्ग सहित हर उम्र के महिला, पुरुष व बच्चे होली के रंग में सराबोर रहते हैं। यूं कहें कि पहले दिन की होली से बुढ़वा काफी मजेदार होता है।

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