रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और मानवीय संवेदना को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम- प्रो लावण्य कीर्ति
कहानी को मंच पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने हेतु कल्पनाशीलता, अभिनय कौशल, संवाद अदायगी एवं मंचीय अनुशासन आवश्यक- कुंदन कुमार
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के ललित कला संकाय के अंतर्गत विश्वविद्यालय संगीत एवं नाट्य विभाग द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय रंगमंचीय कार्यशाला ‘कहानी और रंगमंच’ का आज सोमवार को भव्य शुभारंभ हुआ। 8 जून से 12 जून, 2026 तक चलने वाली इस कार्यशाला का उद्देश्य विद्यार्थियों एवं रंगकर्मियों को रंगमंच की विविध विधाओं, अभिनय कला तथा नाट्य प्रस्तुति की बारीकियों से परिचित कराना है। कार्यक्रम में विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं कला-प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
कार्यशाला का आयोजन विभागाध्यक्ष एवं संयोजक प्रो लावण्य कीर्ति सिंह ‘काव्या’ के मार्गदर्शन में किया जा रहा है। उद्घाटन सत्र में उपस्थित प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह समाज, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त साधन है। कहा कि कहानी और रंगमंच का संबंध अत्यंत गहरा है तथा किसी भी कहानी को जीवन्त रूप प्रदान करने में रंगमंच महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसी कार्यशालाएँ विद्यार्थियों की रचनात्मक क्षमता को विकसित करने के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व निर्माण में भी सहायक होती हैं।
कार्यशाला के मुख्य प्रशिक्षक एवं पटना के ‘भिखारी ठाकुर युवा सम्मान’ से सम्मानित रंगकर्मी कुंदन कुमार ने अपने संबोधन में कहानी और रंगमंच के अंतर्संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि साहित्य में लिखी गई कहानी को मंच पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए कल्पनाशीलता, अभिनय कौशल, संवाद अदायगी तथा मंचीय अनुशासन की आवश्यकता होती है। उन्होंने प्रतिभागियों को अभिनय के मूल सिद्धांतों, शारीरिक अभिव्यक्ति, स्वर-साधना, संवाद प्रस्तुति तथा चरित्र निर्माण की तकनीकों की जानकारी दी।
प्रशिक्षण सत्र के दौरान प्रतिभागियों को विभिन्न व्यावहारिक गतिविधियों में शामिल किया गया। समूह अभ्यास, अभिनय प्रयोग, तात्कालिक प्रस्तुति तथा संवाद-अभिनय के माध्यम से विद्यार्थियों को मंचीय कला के विविध आयामों से अवगत कराया गया। प्रशिक्षक ने बताया कि रंगमंच व्यक्ति के आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, अभिव्यक्ति कौशल तथा सामाजिक चेतना के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है। कार्यशाला में कहानी के चयन, उसके नाट्य रूपांतरण, पटकथा निर्माण, मंच-सज्जा, प्रकाश व्यवस्था, ध्वनि प्रभाव तथा प्रस्तुति तकनीकों पर भी विस्तार से चर्चा की गई। प्रतिभागियों को यह समझाया गया कि किसी साहित्यिक रचना को रंगमंच पर प्रस्तुत करते समय उसकी मूल भावना को बनाए रखते हुए उसे दर्शकों के लिए अधिक प्रभावशाली और संप्रेषणीय बनाना आवश्यक होता है।
विद्यार्थियों ने कार्यशाला के प्रथम दिवस के अनुभव को अत्यंत प्रेरणादायक एवं ज्ञानवर्धक बताया। प्रतिभागियों ने कहा कि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम उन्हें रंगमंच की व्यावहारिक समझ प्रदान करते हैं तथा उनकी सृजनात्मक प्रतिभा को नई दिशा देते हैं। कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक कई प्रश्न पूछे, जिनका प्रशिक्षक द्वारा विस्तार से उत्तर दिया गया। अंत में विभागाध्यक्ष प्रो लावण्य कीर्ति सिंह ‘काव्या’ ने सभी प्रतिभागियों को नियमित रूप से कार्यशाला में भाग लेने के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि आगामी दिनों में अभिनय, निर्देशन, मंच-प्रबंधन, नाट्य लेखन तथा प्रस्तुति कला से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर विशेष प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह कार्यशाला विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी तथा विश्वविद्यालय में रंगमंचीय गतिविधियों को नई ऊर्जा प्रदान करेगी।
कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। पाँच दिनों तक चलने वाले इस कार्यशाला में प्रतिभागियों को रंगमंच की सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों प्रकार की शिक्षाएं प्रदान की जाएंगी, जिनसे वे अपनी कलात्मक प्रतिभा को और अधिक निखार सकें।





















































