मध्यकालीन हिन्दी साहित्य के करीब 50-60 ग्रन्थों को चित्रकला से दर्शाना, उनके अंतर्संबंध को व्यक्त करता है- प्रो उमेश कुमार
हिन्दी विभाग, एम आर महिला कॉलेज, दरभंगा में प्रधानाचार्य प्रो एल पी जायसवाल की अध्यक्षता में “मध्यकालीन हिन्दी साहित्य एवं चित्रकला का अंतर्सम्बन्ध” विषय पर संगोष्ठी एवं स्नातकोत्तर चतुर्थ सेमेस्टर के छात्राओं के विदाई समारोह का आयोजन किया गया। शुरुआत में हिन्दी की विभागाध्यक्ष डॉ नीलम सेन द्वारा अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ तथा कलम भेंटकर किया गया। संगोष्ठी के अध्यक्ष प्रो लक्ष्मण प्रसाद जयसवाल, मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो उमेश कुमार एवं विशिष्ट अतिथि विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग के प्राध्यापक डॉ आर एन चौरसिया आदि के स्वागत के उपरांत शिक्षिका डॉ नीलम सेन ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि चित्र में प्रभावशीलता अधिक होती है, जिसका असर हमारे मानस पर प्रभावी रूप से लंबे समय तक बना रहता है। पीआरओ डॉ आरएन चौरसिया ने विषय को विस्तृत एवं प्रासंगिक बताते हुए कहा कि मध्यकालीन हिन्दी साहित्य और चित्रकला का अंतर्संबंध काफी गहरा और आपसी प्रतिक्रिया पूर्ण है जो एक-दूसरे के पूरक एवं अन्योन्याश्रित हैं। दोनों एक ही सांस्कृतिक-धार्मिक वातावरण में विकसित हुए, जिनमें जीवन दर्शन की गहरी अभिव्यक्ति हुई है। ये चित्र न केवल कथा-कथन के सहायक बने, बल्कि जनसाधारण के लिए दृश्य-ग्रन्थ भी बन गए।
मुख्य वक्ता प्रो उमेश कुमार ने कहा कि 7 वीं सदी में अंकित अजंता- एलोरा गुफा के चित्र साहित्य का भी परिचय देते हैं। 14वीं से 19वीं सदी के बीच लगभग 600 वर्षों का काल- खण्ड जो मध्य कालीन हिन्दी साहित्य कहा जाता है, जिसमें करीब 50-60 ग्रन्थ ऐसे हैं जो साहित्य और चित्रकला के अंतर्संबंध को दर्शाते हैं। सूर, तुलसी, केशव, बिहारी लाल, पद्माकर आदि के साहित्य पर चित्र बनाए गए हैं। कहा कि हिन्दी भक्ति-काव्य और चित्रकला ने एक-दूसरे को विषय, रूपक और भाव-प्रतिमान प्रदान किये। हिन्दी साहित्य में चित्रकला के लिए विषय-सामग्री और दार्शनिक- आध्यात्मिक प्रांगण दिया। वहीं चित्रकला ने साहित्य के लिए दृश्य-संस्करण, भाव-संवेदनशील बनावट और जनसंचार का नया माध्यम प्रदान किया।
प्रो एल पी जायसवाल ने संगोष्ठी के विषय को विस्तृत एवं शोधोपयोगी बताते हुए अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि साहित्य और चित्रकला पुरानी परंपराओं को जीवित रखने का बड़े माध्यम हैं। बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा चित्रयुक्त पुस्तकों से होती है, क्योंकि चित्र का बच्चों के ऊपर मनोरंजक ढंग से स्थायी प्रभाव पड़ता है। कार्यक्रम का संचालन डॉ नीलम सेन द्वारा किया गया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ सूफिया फातमी ने किया। इस कार्यक्रम में मनोविज्ञान की शिक्षिका डॉ अल्पना कुमारी, डॉ अनुपम प्रिया, डॉ शमा परवीन, शिक्षिका, गृह विज्ञान विभाग, लेखापाल पवन कुमार झा एवं स्नातकोत्तर हिन्दी की लगभग 120 छात्राएं उपस्थित रहीं, जिनमें चतुर्थ सेमेस्टर की छात्राओं को सदर विदाई भी दी गई।
[5/21, 5:51 PM] chandrakanta2008rk: ,
























































