परीक्षा में सफल होने वाले छात्रों की कामयाबी का सफर

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समस्तीपुर, सरायरंजन।

आयुष कुमार को कभी अपना बचपन जीने का मौका हीं नहीं मिला।
बिहार के समस्तीपुर जिले के रायपुर बुजुर्ग गाँव में रहने वाले बाकी बच्चों की तरह, उसने अपने स्कूल के दिन परिवार की कमाई में हाथ बंटाते हुए बिताए। उसने कभी-कभार स्कूल जाने की कोशिश की, लेकिन धीरे-धीरे पढ़ाई और काम के बीच तालमेल बिठाना बहुत मुश्किल हो गया।
इसका बुरा असर उसकी पढ़ाई पर पड़ा। धीरे-धीरे हिम्मत टूटने लगी। एक बार तो वह परीक्षा में फेल हो गया और उसे लगने लगा कि अब पढ़ाई छोड़ देना हीं सही है।
लेकिन आज, 17 साल की उम्र में, आयुष के पास बिहार बोर्ड से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने का सर्टिफ़िकेट है।
बाल मजदूरी छोड़कर स्कूल की पढ़ाई पूरी करने तक का यह सफर बहुत लंबा होने के साथ-साथ मुश्किल भी था। लेकिन इस सफर ने बड़ी खामोशी से आयुष के साथ-साथ समस्तीपुर के गाँवों के कई दूसरे बच्चों की किस्मत बदल दी है।
इस साल जब बिहार बोर्ड का रिजल्ट आया तो कई घरों में जश्न का माहौल था। सबसे ज़्यादा खुश वे परिवार थे, जिन्हें लगता था कि उनके बच्चे कभी स्कूल वापस नहीं आ पाएंगे।
खालिसपुर गाँव की 17 साल की लक्ष्मी कुमारी एक मुसहर परिवार से है, जो बिहार के सबसे पिछड़े समुदायों में से एक है। लक्ष्मी ने अपने माता-पिता को हमेशा दिहाड़ी के लिए जूझते देखा है। कई बार ऐसी नौबत आती थी कि दो वक्त की रोटी कमाना स्कूल जाने से ज़्यादा ज़रूरी हो जाता था। नौवीं कक्षा में उसकी पढ़ाई छूट गई। कुछ दिनों बाद ही, वह गाँव की दूसरी लड़कियों के साथ खेतों में मजदूरी करने लगी। उसी दौरान उसकी शादी की बातचीत भी शुरू हो गई थीं।
लेकिन, लक्ष्मी ने कभी नहीं चाहा कि उसका भविष्य ऐसा हो।
जब कुछ स्थानीय समूहों और कार्यकर्ताओं को उसकी हालत के बारे में पता चला, तो उन्होंने उसके परिवार से नियमित रूप से मिलना शुरू कर दिया। शुरुआत में कुछ मिनटों की बातचीत हफ्तों और महीनों तक बार-बार होने वाली चर्चा में बदल गई। धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा।
लक्ष्मी ने फिर से पढ़ाई शुरू कर दी। इस साल उसने बिहार बोर्ड से दसवीं की परीक्षा पास कर ली और वह अपने पूरे मुसहर टोले में दसवीं पास करने वाली दूसरी लड़की बन गई।
हो सकता है बाहर की दुनिया में यह कामयाबी बहुत बड़ी न लगे, लेकिन उसके गाँव के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
और उसी के पास के एक गाँव में, एक और लड़की अपनी एक अलग लड़ाई लड़ रही थी।
निशा कुमारी ने स्कूल जाना छोड़ दिया था और वह अपनी माँ के साथ खेतों में काम करने जाने लगी थी। इसी दौरान, उसके माता-पिता ने उसकी शादी की चर्चा शुरू कर दी। उन्हें अपनी बेटी की फिक्र तो थी, लेकिन वे बस गरीबी से परेशान थे। उस इलाके में काम करने वाली चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) की सहयोगी संस्था, जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र (JJBVK) के एक सदस्य बताते हैं, “उन्होंने हमसे लगातार यही बात कही कि उनके पास कोचिंग, किताबों या परीक्षा का खर्च उठाने के लिए पैसे नहीं है। दूसरे कई परिवारों की तरह, उन्हें भी यही लगता था कि शादी करने से शायद एक समस्या हल हो जाएगी।”
लेकिन निशा ऐसा नहीं सोचती थी। उसने अपने घरवालों को बार-बार कहा कि शादी हुई तो उसकी पढ़ाई ज़रूर छूट जाएगी। फिर उसे किशोरों के समूहों, काउंसलिंग सत्रों और परिवार के साथ लगातार बातचीत से सहारा मिला। धीरे-धीरे घर में शादी के बजाय पढ़ाई के बारे में बात होने लगी।

आज, निशा ने अपनी दसवीं की परीक्षा पास कर ली है और फिलहाल 11वीं कक्षा में पढ़ रही है। आयुष, लक्ष्मी और निशा की कहानियों में जो बात एक जैसी है, वो सिर्फ़ उनका पक्का इरादा नहीं है। बल्कि, इसमें बच्चों की सहायता के लिए मौजूद सपोर्ट सिस्टम का भी उतना ही योगदान है, जिन्होंने इन बच्चों को पढ़ाई से पूरी तरह दूर होने से पहले सही वक्त पर सहारा दिया।
सरायंजन ब्लॉक के गाँवों में, सामुदायिक समूहों, बाल पंचायतों, किशोरों के समूहों और शिक्षा सहायता केंद्रों ने ऐसे बच्चों की पहचान करने में मदद की है, जो बाल मजदूरी, बाल विवाह और स्कूल छोड़ने के खतरे में थे। इनमें से कई बच्चे इसलिए संघर्ष नहीं कर रहे थे कि उनमें काबिलियत की कमी थी। बल्कि हालात ऐसे थे कि उनके पास पढ़ाई छोड़ने के सिवा कम विकल्प बचे थे।
आयुष ने उन बातों को याद करते हुए अपने सफर के बारे में बताया। उसने कहा, “मैंने अपने अनुभवों से सीखा है कि अगर बच्चे को समय पर सही सहारा और मार्गदर्शन मिले, तो वह उन मुश्किलों से भी लड़ सकता है जो कभी नामुमकिन सी लगती हैं।”
बीते कई सालों से, बच्चों, परिवारों और समुदायों के साथ लगातार काम करने वाली संस्था, जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र की कोशिशों से बच्चों को यह मदद मिल रही है। जवाहर ज्योति बाल विकास केंद्र के प्रोजेक्ट हेड-सह-सचिव सुरेंद्र कुमार के मुताबिक, बोर्ड की परीक्षा के नतीजे तो एक बड़ी कहानी का सिर्फ़ एक हिस्सा हैं। उन्होंने कहा, “ऐसी बात नहीं है कि, पढ़ाई में हमारी ओर से दी जाने वाली मदद की वजह से बच्चे सिर्फ परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। इस प्रोजेक्ट के जरिए लाइफ़ स्किल ट्रेनिंग और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े उपायों को अपनाने की वजह से बच्चों में समझ और आत्मविश्वास भी विकसित हुआ है। यहाँ तक कि कई बच्चों ने अपने दोस्तों की शादी रुकवाकर उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए हिम्मत दी है। इसका असर अब बोर्ड परीक्षा के नतीजों में भी साफ दिखाई दे रहा है।”
ये आंकड़े साफ तौर पर बदलाव की ओर इशारा करते हैं। इस साल हमारे प्रोजेक्ट के दायरे में आने वाले इलाकों में 78% लड़कियां और 76% लड़के दसवीं की बोर्ड परीक्षा में सफल रहे। इंटरमीडिएट की परीक्षा में, लड़कियों के पास होने की दर 88 प्रतिशत रही।
फिर भी, इन नतीजों की अहमियत सिर्फ आंकड़ों से कहीं बढ़कर है। हर एक प्रतिशत का मतलब है एक बच्चा, जिसने काम का बोझ होने के बावजूद अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी, एक ऐसी लड़की जिसने शादी की बात को टाल दिया, या एक ऐसा परिवार जिसने आर्थिक तंगी के बावजूद बच्चों को पढ़ाने का रास्ता चुना।
क्राई (ईस्ट) की रीजनल डायरेक्टर, ट्रिना चक्रवर्ती का मानना है कि ये कहानियाँ बाल अधिकारों के काम का असली मकसद दिखाती हैं। उन्होंने कहा, “अक्सर बाल मजदूरी तब शुरू होती है जब बच्चों के पास कोई विकल्प नहीं बचता है। जब बच्चों को स्कूल में पढ़ाई जारी रखने, खुद पर भरोसा करने और अपने अधिकारों को समझने में मदद मिलती है, तो वे एक बेहतर भविष्य के सपने देखने लगते हैं। ये कामयाबी बताती हैं कि बच्चों, परिवारों और समुदायों के साथ लगातार जुड़े रहकर गरीबी के उस चक्र को तोड़ा जा सकता है, जो अक्सर एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक चला जाता है।”
इस तरह की अलग-अलग कहानियाँ बिहार में बच्चों की असुरक्षा की एक बड़ी तस्वीर पेश करती हैं। NCRB के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि, पूरे देश में इसी राज्य से बच्चों और बच्चियों के लापता होने के सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं, जिनमें से हज़ारों का अभी भी पता नहीं चल पाया है। बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों के लिए, यह इस बात को और पुख्ता करता है कि बच्चों का स्कूल, समुदाय और स्थानीय सुरक्षा तंत्र से जुड़े रहना कितना ज़रूरी है। इससे खतरों की समय रहते पहचान की जा सकती है और उनके हालात बिगड़ने से पहले कदम उठाए जा सकते हैं।
आज जब दुनिया बाल श्रम निषेध दिवस मना रही है, तो आयुष, लक्ष्मी और निशा की कहानियाँ याद दिलाती हैं कि सिर्फ़ बच्चों को मजदूरी से बाहर निकालना ही काफी नहीं है।
हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनके पास वापस लौटने के लिए कोई ऐसी जगह हो, जो उनके लिए सबसे ज्यादा मायने रखे। इन तीन युवाओं के लिए उनके स्कूल की कक्षा वो जगह थी। और इसने उनकी ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी।

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