शिक्षक को सम्मान की नहीं, समाज की स्मृति में जीवित रहने की जरूरत है

72

मेरी पहली पाठशाला गाँव थी। वहाँ किताबें सीमित थीं, लेकिन जीवन खुली किताब था। खेतों की पगडंडियों से लेकर लोगों के संघर्ष तक, हर अनुभव कोई न कोई पाठ पढ़ाता था। शायद वहीं पहली बार समझ आया कि शिक्षा केवल अक्षरों का ज्ञान नहीं, मनुष्य और उसके समय को पढ़ने की क्षमता है। बाद में जीवन मुझे लंगट सिंह महाविद्यालय, मुजफ्फरपुर तक लाया, जहाँ से स्नातक किया। फिर ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर और आज पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना में राजनीति विज्ञान के शोधार्थी के रूप में मेरी यात्रा जारी है। विश्वविद्यालय बदलते गए, लेकिन सीखने की प्रक्रिया लगातार गहरी होती गई। इस यात्रा में कुछ शिक्षक ऐसे मिले, जिन्होंने पाठ्यक्रम से अधिक दृष्टि दी।
प्रो. जितेन्द्र नारायण से राजनीति को केवल सत्ता और संस्थाओं के अध्ययन के बजाय विचार और समाज की व्यापक प्रक्रिया के रूप में देखने की प्रेरणा मिली। प्रो. मुनेश्वर यादव ने राजनीति को जमीन पर—समाज, चुनाव और मतदाता के बीच—समझने की दृष्टि को मजबूत किया। प्रो. बिमल प्रसाद सिंह के अकादमिक सान्निध्य ने समकालीन राजनीतिक प्रश्नों को गंभीरता से देखने और उन्हें शोध के अनुशासन में रखने की प्रेरणा दी। वहीं प्रो. सुरेन्द्र कुमार से संस्थाओं, सुशासन और लोकतांत्रिक जवाबदेही जैसे प्रश्नों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने का अवसर मिला। इन शिक्षकों का प्रभाव किसी एक प्रमाणपत्र में दर्ज नहीं है।
कुछ प्रभाव कागज पर नहीं, व्यक्ति के भीतर दर्ज होते हैं। यही शिक्षक की सबसे बड़ी विशेषता है।
एक शिक्षक हमें केवल यह नहीं बताता कि क्या सोचना है; वह धीरे-धीरे हमें यह समझने योग्य बनाता है कि किसी बात को स्वीकार करने से पहले उसके बारे में सोचना क्यों जरूरी है। आज शिक्षा का संसार तेजी से बदल रहा है। डिजिटल कक्षाएँ हैं, ऑनलाइन विश्वविद्यालय हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ सेकंड में हजारों उत्तर सामने रख सकती है। लेकिन इस तकनीकी क्रांति के बीच एक बुनियादी प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्या हमारे पास उत्तर बढ़ रहे हैं या समझ? क्योंकि उत्तर उपलब्ध होना और विवेकशील होना एक ही बात नहीं है।

मशीन बता सकती है कि क्या लिखा गया है;शिक्षक यह सिखाता है कि उसमें क्या छिपा है। मशीन सूचना दे सकती है, शिक्षक सूचना और सत्य के बीच अंतर करना सिखाता है और शायद सबसे महत्वपूर्ण—मशीन हमारे लिए उत्तर खोज सकती है, लेकिन सही प्रश्न की नैतिक जिम्मेदारी अभी भी मनुष्य की है। यहीं शिक्षा का संबंध लोकतंत्र से जुड़ता है।
आज जब मैं भारतीय राजनीति में मतदाता के बदलते निर्धारकों पर शोध कर रहा हूँ, तो बार-बार यह महसूस होता है कि लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं है। लोकतंत्र उस नागरिक चेतना का नाम भी है जो सवाल पूछती है, तर्क करती है, असहमति को स्वीकार करती है और सत्ता से जवाब मांगती है। इसलिए किसी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल उसके मतदान प्रतिशत में नहीं, बल्कि इस बात में भी छिपी होती है कि उसके नागरिक कितने स्वतंत्र होकर सोच सकते हैं और स्वतंत्र सोच की पहली प्रयोगशाला कक्षा है।इसीलिए शिक्षक दिवस पर केवल शिक्षकों को शुभकामनाएँ देना पर्याप्त नहीं लगता। हमें अपने आप से पूछना चाहिए— क्या हमारी शिक्षा-व्यवस्था ऐसे विद्यार्थी पैदा कर रही है जो प्रश्न पूछ सकें? क्या शिक्षक स्वयं प्रश्न पूछने के लिए स्वतंत्र है? क्या विद्यार्थी शिक्षक से असहमति व्यक्त कर सकता है? क्या विश्वविद्यालय विचारों की विविधता के लिए पर्याप्त जगह दे रहे हैं? अगर इन प्रश्नों का उत्तर असहज है, तो शिक्षक दिवस का उत्सव जितना भव्य होगा, उसकी विडंबना उतनी ही गहरी होगी। क्योंकि शिक्षक को केवल मंच पर सम्मानित करके सम्मान नहीं दिया जा सकता। उसे सम्मान तब मिलता है जब समाज उसके विचार की स्वतंत्रता की रक्षा करता है और विद्यार्थी उसके प्रश्न करने के अधिकार को समझता है। मेरे जीवन में मिले सभी शिक्षकों के प्रति मेरी कृतज्ञता इसी अर्थ में है। कुछ ने विषय पढ़ाया, कुछ ने अनुशासन, कुछ ने आलोचनात्मक दृष्टि, कुछ ने असफलताओं के बीच टिके रहना और कुछ ने यह साहस दिया कि भीड़ में खड़े होकर भी अपनी बुद्धि का इस्तेमाल किया जा सकता है और शायद हर शिक्षक की यही वास्तविक विरासत है वह विद्यार्थी के जीवन में अपना नाम नहीं, अपना विचार छोड़ जाता है।

मेरी यात्रा में गाँव ने जीवन की भाषा सिखाई, विश्वविद्यालयों ने विचार की भाषा और शिक्षकों ने दोनों के बीच संवाद करना सिखाया। लेखन ने सवालों को शब्द दिए और शोध ने उन शब्दों को प्रमाण की कसौटी पर कसने की जिम्मेदारी दी।
इसलिए शिक्षक दिवस पर मैं शिक्षकों को केवल नमन नहीं करना चाहता।मैं उस शिक्षा-व्यवस्था के पक्ष में खड़ा होना चाहता हूँ जहाँ शिक्षक डर से नहीं, विवेक से पढ़ाए; विद्यार्थी भय से नहीं, जिज्ञासा से सीखे; और विश्वविद्यालय प्रमाणपत्र बाँटने वाली संस्था नहीं, समाज के विवेक का निर्माण करने वाली जगह बने। क्योंकि अंततः किसी देश की सबसे बड़ी संपत्ति उसकी इमारतें, तकनीक या अर्थव्यवस्था नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी संपत्ति वे मनुष्य होते हैं जो सही समय पर सही सवाल पूछने का साहस रखते हैं और ऐसे मनुष्य अचानक पैदा नहीं होते, उन्हें शिक्षक गढ़ते हैं। इसीलिए शिक्षक को एक दिन याद करना पर्याप्त नहीं।जिस समाज को अपना भविष्य बचाना है, उसे अपनी कक्षाओं में प्रश्नों को बचाना होगा।

मेरे सभी शिक्षकों को सादर नमन।

उन्होंने मुझे केवल पढ़ना नहीं सिखाया—उन्होंने मुझे यह समझने की कोशिश करना सिखाया कि आखिर पढ़ना जरूरी क्यों है।
शोधार्थी
रुपेश कुमार यादव
राजनीति विज्ञान विभाग
पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here