हिन्दी दिवस पर विशेष:

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रस्मी हिंदी दिवस

  • भारत के संविधान में पुरुषोत्तम दास टंडन ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रुप में लाने का सवाल जिस दिन उठाया था,उसी दिन को बतौर ‘हिंदी दिवस’ मनाने का संकल्प सरकार ने लिया। लेकिन,न तो सरकार का उद्देश्य सतह पर आज तक आ सका और न उसका परिणाम परिलक्षित हुआ। अंग्रेजियत में डूबे पं नेहरू की सरकार को भी भारत ने झेला और ‘हिन्दू, हिंदी, हिन्दुस्तान’ का नारा देकर सत्ता में आने वाली भाजपा की सरकार को भी देश देख हीं रहा है। यह दिवस और इस अवसर पर आयोजित समारोह केवल सरकारी औपचारिकता तथा रस्म-अदाई में खो गया है। आज़ादी के समय हिंदी के साथ जो समस्याऐं और चुनौतियां थीं, वर्तमान में भी हैं। अपने प्रदेश बिहार को हीं लें। मैथिली, भोजपुरी,मगही, अंगिका आदि पर गहन रुप से शोध करने वाला कोई अकादमी अथवा संस्था राज्य में नहीं है और है भी, तो या तो वह मर चुकी है संस्था अथवा सांस तोड़ती-सी नज़र आ रही है। कुछ हिंदीप्रेमियों ने कुछ काम किए हैं, लेकिन देहात से जनता जब शहर की ओर पलायन की है,तब उन ग्रामीण अंचलों में बोली जाने वाली बोली में जो परिवर्तन हुआ है,मानक हिंदी पर उनके द्वारा प्रयुक्त शैलियां, मुहावरों व कहबियों पर क्या असर होता है, यह किसी के चिंतन में कहां है? प्रश्न उठता है कि हिन्दी को देश अथवा प्रदेश के सूदुर में स्थापित होना है, राष्ट्र को हिंदी तक पहुंचना है? आंचलिक व प्रादेशिक भाषाओं के प्रति देशवासियों का मोह राजनीतिक व अन्य कारणों से बढ़ता जा रहा है, ऐसे में हिंदी के प्रति लोगों का सरोकार कम होना मुनासिब हीं है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का दायित्व जिन संस्थाओं के जिम्मे है,वे सरकारी माल डकारने में मशगूल हैं। दोष संवैधानिक संस्थाओं और उसपर कुंडली मारकर बैठे लोगों का तो है हीं, जनता की अशिक्षित सोच भी इसके लिए कम जवाबदेह नहीं है। सरकार और सरकार चलाने वाली एजेंसियों का अंग्रेजी मोह घटने के सिवा आकाश छूता जा रहा है। ऐसी परिस्थिति में सवाल का खड़ा होना तो लाजिमी ही है कि हम हिंदी दिवस आखिर क्यों मनाते हैं? हमारे देश ने हिंदी को संविधान में राष्ट्रभाषा मानकर भी राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं दे पाया है।देश और देशवासियों के लिए इससे निराशाजनक और असम्मान की बात भला क्या हो सकती है? इंग्लैंड में फ्रेंच यदि षड्यंत्र था, तो भारत में अंग्रेजी क्या है? नरेन्द्र मोदी सरकार को इसका जवाब देश की जनता को देना चाहिए।
    • डॉ परमानन्द लाभ
      स्थापित साहित्यकार व अवकाश प्राप्त मैथिली विभागाध्यक्ष, डॉ शालिग्राम मिश्र महाविद्यालय, गतिरामनगर ,समस्तीपुर। मो ७४८८२०४१०७

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