हिमालय की चेतावनी को अब पढ़ना होगा।

36

नेपाल की जलप्रलय केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि बदलते जलवायु, कमजोर होती पर्वतीय पारिस्थितिकी और हमारी विकास नीति की परीक्षा है।

26 अगस्त 2026 को नेपाल-चीन सीमा के हिमालयी क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर पूरे दक्षिण एशिया को झकझोर दिया। शुरुआत में इसे अचानक आई बाढ़, भूस्खलन अथवा भूकंपीय घटना के रूप में देखा गया, लेकिन बाद के उपग्रह विश्लेषण और वैज्ञानिक आकलनों ने संकेत दिया कि लगभग 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर और उसके नीचे के चट्टानी हिस्से के बड़े पैमाने पर टूटने से बर्फ, चट्टान और मलबे का प्रवाह पैदा हुआ, जिसने नदी के बहाव को बाधित किया और उसके बाद अचानक विनाशकारी बाढ़ का रूप ले लिया। घटना की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बाढ़ ने नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और धादिंग क्षेत्रों को प्रभावित किया, सड़कें और पुल बह गए, बस्तियां तबाह हुईं तथा कई जलविद्युत परियोजनाओं और सुरंगों में काम कर रहे लोग फंस गए। 30 अगस्त तक उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में मृतकों की संख्या सैकड़ों में और लापता लोगों की संख्या हजारों में पहुंच चुकी थी; राहत एवं बचाव अभियान अभी जारी था, इसलिए आंकड़े लगातार बदल रहे हैं। लेकिन इस पूरी घटना को केवल मृतकों और लापता लोगों की संख्या से समझना पर्याप्त नहीं होगा। मेरे लिए इसका सबसे गंभीर पक्ष यह है कि हिमालय हमें एक ऐसी समस्या का संकेत दे रहा है जिसकी शुरुआत आज नहीं हुई है और जिसका अंत भी इस आपदा के साथ नहीं होने वाला।
आपदा अचानक थी, लेकिन संकट पुराना है
नेपाल की घटना को यदि केवल एक आकस्मिक प्राकृतिक दुर्घटना मान लिया जाए तो हम इसकी सबसे महत्वपूर्ण सीख खो देंगे।
मार्च 2026 में प्रकाशित ICIMOD के व्यापक आकलन के अनुसार हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों में बर्फ की क्षति की दर वर्ष 2000 के बाद लगभग दोगुनी हो गई है। 1990 से 2020 के बीच इस क्षेत्र के ग्लेशियरों के कुल क्षेत्रफल में लगभग 12 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। रिपोर्ट यह भी बताती है कि छोटे ग्लेशियर अपेक्षाकृत तेजी से सिकुड़ रहे हैं और इससे ग्लेशियल झीलों तथा अचानक आने वाली बाढ़ का जोखिम बढ़ रहा है। अगस्त 2026 में ही ICIMOD ने हिंदूकुश-हिमालय के लिए क्षेत्रीय क्रायोस्फियर रणनीति जारी करते हुए कहा कि ग्लेशियर, बर्फ और पर्माफ्रॉस्ट तेजी से बदल रहे हैं तथा नदी प्रवाह अधिक अनिश्चित हो रहा है। इस क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर हैं, लेकिन निगरानी अभी भी बेहद सीमित और असमान है।
इसका अर्थ बहुत साफ है—हमारे सामने समस्या ग्लेशियर टूटने की एक घटना नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे बदलाव की है। जलवायु परिवर्तन इस संकट का एक महत्वपूर्ण कारण है, लेकिन पूरी कहानी केवल जलवायु परिवर्तन की नहीं है। बढ़ता तापमान, पर्माफ्रॉस्ट का कमजोर होना, ग्लेशियरों का पीछे हटना, अनियमित वर्षा, भूस्खलन, सड़क और सुरंग निर्माण, जलविद्युत परियोजनाएं, पर्यटन का दबाव और संवेदनशील क्षेत्रों में बढ़ती मानवीय गतिविधियां मिलकर जोखिम को और जटिल बना रही हैं। वैज्ञानिक आकलन भी चेताते हैं कि गर्म होती जलवायु ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ढलानों की स्थिरता और हिमनदीय जोखिमों को प्रभावित कर सकती है, हालांकि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ने के लिए अलग वैज्ञानिक विश्लेषण आवश्यक है।
यही अंतर समझना जरूरी है। जलवायु परिवर्तन जोखिम को बढ़ा सकता है, लेकिन आपदा का वास्तविक रूप स्थानीय भूगोल, मौसम, निर्माण और मानवीय हस्तक्षेप के मेल से तय होता है। हिमालय में विकास बनाम प्रकृति का सवाल नहीं, विकास के तरीके का सवाल है। अक्सर जब ऐसी घटनाएं होती हैं तो दो पक्ष सामने आ जाते हैं—एक कहता है कि यह जलवायु परिवर्तन का परिणाम है और दूसरा कहता है कि यह प्राकृतिक घटना है। दोनों के बीच बहस चलती रहती है, जबकि जमीन पर समस्या कहीं अधिक जटिल होती है।
हिमालय में सड़कें चाहिए, बिजली चाहिए, अस्पताल चाहिए, संचार चाहिए, पर्यटन चाहिए, रोजगार चाहिए, जलविद्युत चाहिए। पहाड़ों में रहने वाले लोगों को विकास से वंचित नहीं किया जा सकता। लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि पहाड़ को मैदान मान लिया जाए।पर्वतीय क्षेत्र की अपनी वहन क्षमता होती है। वहाँ एक सड़क बनाने के लिए जिस चट्टान को काटा जाता है, वह केवल सड़क की जगह नहीं बदलती, बल्कि ढलान की स्थिरता भी प्रभावित कर सकती है। नदी के प्राकृतिक मार्ग के किनारे निर्माण केवल जमीन का उपयोग नहीं है, बल्कि बाढ़ के भविष्य के रास्ते को भी प्रभावित कर सकता है। नेपाल की मौजूदा आपदा में जलविद्युत परियोजनाओं और सुरंगों से जुड़े सैकड़ों लोगों के फंसे होने की खबरों ने इस प्रश्न को और गंभीर बना दिया है। 30 अगस्त तक उपलब्ध रिपोर्टों में नेपाल के रसुवा और नुवाकोट जिलों की कई जलविद्युत परियोजनाओं से लगभग 900 लोगों के लापता या संपर्क से बाहर होने की बात सामने आई। इससे एक महत्वपूर्ण नीति प्रश्न निकलता है— क्या परियोजना की आर्थिक उपयोगिता के साथ उसके आपदा जोखिम की कीमत भी उसी गंभीरता से आंकी जाती है?यदि नहीं, तो हमारी परियोजना स्वीकृति प्रक्रिया अधूरी है। हिमालय की आपदा सीमा नहीं पहचानती, नेपाल की घटना का सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक पक्ष भी है। जिस क्षेत्र में यह आपदा शुरू हुई, वहाँ से निकलने वाला पानी और मलबा सीमा पर रुक नहीं गया। प्रारंभिक प्रवाह लहडें नदी तंत्र से होकर भोटे कोशी और फिर त्रिशूली नदी तक पहुंचा। त्रिशूली आगे नारायणी नदी का हिस्सा बनती है और भारत में यही नदी गंडक के रूप में जानी जाती है। इस कारण नेपाल में पैदा हुआ जल संकट भारत के नदी तंत्र से सीधे जुड़ जाता है।
भारत के केंद्रीय जल आयोग के दस्तावेज भी बताते हैं कि बिहार और उत्तर प्रदेश में बाढ़ पैदा करने वाली कई प्रमुख नदियों का उद्गम नेपाल में है। भारत-नेपाल के बीच बाढ़ पूर्वानुमान और चेतावनी के लिए 1989 से एक संयुक्त व्यवस्था भी संचालित है, जिसमें नेपाल और भारत के विभिन्न मौसम एवं जलमापी केंद्रों से आंकड़े लिए जाते हैं।

           केंद्रीय जल आयोग-इसका अर्थ है कि हमारे पास सहयोग का आधार पहले से मौजूद है।आवश्यकता अब उसे ग्लेशियर, उपग्रह, वास्तविक समय के आंकड़ों और आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणाली से जोड़ने की है। हमारी सबसे बड़ी कमी चेतावनी की नहीं, चेतावनी को कार्रवाई में बदलने की है। आज तकनीक हमारे पास पहले से कहीं अधिक है। उपग्रह हमें ग्लेशियरों की स्थिति बता सकते हैं। ड्रोन दुर्गम क्षेत्रों की तस्वीरें ले सकते हैं।

रडार नदी और मौसम की निगरानी कर सकते हैं।सेंसर जलस्तर में बदलाव बता सकते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान में मदद कर सकती है। भारत का NDMA भी बहु-आपदा और जियो-टार्गेटेड चेतावनी के लिए SACHET जैसी व्यवस्था चला रहा है, जिसके माध्यम से मोबाइल, एसएमएस और अन्य माध्यमों से चेतावनी पहुंचाई जा सकती है। फिर भी प्रश्न यह है कि जो चेतावनी वैज्ञानिक केंद्र से निकलती है, वह अंतिम व्यक्ति तक कितनी जल्दी और कितनी विश्वसनीयता के साथ पहुंचती है? किसी पहाड़ी गांव के व्यक्ति के पास चेतावनी पहुंचने और उसके सुरक्षित स्थान तक पहुंचने के बीच यदि केवल दस-पंद्रह मिनट हैं, तो उसके लिए चेतावनी तभी उपयोगी है जब पहले से तय हो— कहाँ जाना है, किस रास्ते जाना है, कौन लोगों को निकालने की जिम्मेदारी लेगा, बुजुर्गों, बच्चों और दिव्यांगों को कौन ले जाएगा, पशुधन को कहाँ ले जाना है और यदि सड़क पहले ही टूट चुकी हो तो वैकल्पिक मार्ग क्या होगा। यानी पूर्व चेतावनी तभी जीवन बचाती है जब उसके साथ पूर्व तैयारी भी हो। अब क्या किया जाना चाहिए? 1. हिमालय के लिए साझा निगरानी तंत्र- भारत, नेपाल, भूटान और चीन को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर हिमालय के लिए साझा वैज्ञानिक निगरानी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। ग्लेशियरों, ग्लेशियल झीलों, पर्माफ्रॉस्ट, बर्फ और प्रमुख नदी घाटियों की लगातार निगरानी हो। ICIMOD की नई क्षेत्रीय क्रायोस्फियर रणनीति भी इसी दिशा में मानकीकृत निगरानी, साझा डेटा और क्षेत्रीय क्षमता निर्माण पर जोर देती है।

  1. ग्लेशियल झीलों और कमजोर ढलानों की जोखिम-सूची :- सिर्फ यह पता लगाना पर्याप्त नहीं कि कितने ग्लेशियर हैं। यह भी पता होना चाहिए कि उनमें से कौन-से ग्लेशियर अथवा झीलें सबसे अधिक जोखिम पैदा कर सकती हैं। हर संवेदनशील ग्लेशियर और ग्लेशियल झील का जोखिम मानचित्र तैयार होना चाहिए और उसे समय-समय पर अपडेट किया जाना चाहिए।
  2. सीमा-पार वास्तविक समय डेटा साझा किया जाए – नेपाल में यदि किसी ऊंचाई वाले क्षेत्र में अचानक ग्लेशियर टूटता है, झील का जलस्तर बढ़ता है या नदी का प्रवाह असामान्य होता है, तो इसकी जानकारी नीचे बसे देशों और राज्यों तक मिनटों में पहुंचनी चाहिए। नेपाल और चीन के बीच डेटा साझेदारी को लेकर हाल की चर्चा बताती है कि यह आवश्यकता अब केवल वैज्ञानिक नहीं बल्कि तत्काल प्रशासनिक जरूरत बन चुकी है।
  3. नदी को प्रशासनिक सीमा नहीं, एक प्राकृतिक इकाई माना जाए- नेपाल की पहाड़ी नदी का पानी बिहार तक आता है। इसलिए नेपाल में खतरे की जानकारी बिहार के नदी तटवर्ती जिलों तक पहुंचनी चाहिए। बिहार के लिए विशेष रूप से गंडक और उससे जुड़ी नदी प्रणालियों के संदर्भ में ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र की निगरानी को आपदा प्रबंधन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
  4. निर्माण से पहले ‘जलवायु और आपदा जोखिम ऑडिट’ अनिवार्य हो- हर सड़क, सुरंग, जलविद्युत परियोजना या बड़े पर्यटन ढांचे की पर्यावरणीय स्वीकृति के साथ यह भी देखा जाए कि— यदि अत्यधिक वर्षा हुई तो क्या होगा? यदि भूस्खलन हुआ तो क्या होगा? यदि ग्लेशियल फ्लड आया तो क्या होगा? यदि नदी ने अपना मार्ग बदला तो क्या होगा? यदि इन प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर नहीं है तो परियोजना की डिजाइन बदलनी चाहिए, और जरूरत पड़े तो परियोजना का स्थान भी।
  5. स्थानीय समुदाय को पहली सुरक्षा पंक्ति बनाया जाए- किसी भी आपदा में हेलीकॉप्टर बाद में पहुंचता है, स्थानीय व्यक्ति पहले पहुंचता है।
    इसलिए गांव-स्तर पर आपदा स्वयंसेवक, सुरक्षित स्थान, निकासी मार्ग, प्राथमिक चिकित्सा, संचार व्यवस्था और नियमित अभ्यास होना चाहिए।
  6. जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण विभाग का विषय न माना जाए- जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर है, पानी पर है, बिजली पर है, सड़क पर है, स्वास्थ्य पर है और रोजगार पर भी है।
    इसलिए इसे केवल पर्यावरण मंत्रालय की फाइल में रखने से समस्या हल नहीं होगी। यह विकास नीति का केंद्रीय विषय होना चाहिए।

एक शोधार्थी के रूप में जब मैं पिछले वर्षों की हिमालयी घटनाओं, वैज्ञानिक अध्ययनों और वर्तमान नेपाल त्रासदी को एक साथ रखकर देखता हूँ तो मुझे सबसे बड़ी कमी संसाधनों की नहीं, बल्कि हमारी सोच में दिखाई देती है। हम अभी भी आपदा को एक घटना मानते हैं, जबकि बदलती जलवायु के दौर में आपदा एक लगातार बढ़ता हुआ जोखिम है। मेरी दृष्टि में अब विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय ऐसा विकास मॉडल बनाना होगा जिसमें सड़क, बिजली और रोजगार के साथ पहाड़ की वहन क्षमता और स्थानीय समुदाय की सुरक्षा भी विकास की सफलता का पैमाना बने। मुझे लगता है कि भारत को नेपाल सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र के साथ मिलकर एक स्थायी, वैज्ञानिक और पारदर्शी हिमालय आपदा-पूर्व चेतावनी एवं साझा डेटा तंत्र विकसित करना चाहिए, जिसकी अंतिम कड़ी गाँव और नदी किनारे रहने वाले व्यक्ति तक हो। क्योंकि सरकार की सबसे अच्छी चेतावनी भी तब अधूरी है, जब वह उस व्यक्ति तक समय पर नहीं पहुंचती जिसके घर के दरवाजे तक बाढ़ पहुंचने वाली है।
सबक अतीत का है, फैसला भविष्य का। 2021 की चमोली त्रासदी से लेकर नेपाल की वर्तमान घटना तक घटनाओं का स्वरूप हमें एक ही दिशा में देखने को मजबूर करता है—हिमालय बदल रहा है और उसके साथ हमें भी अपनी नीतियां बदलनी होंगी। ICIMOD के 2026 के आकलन में ग्लेशियरों के तेजी से सिकुड़ने और बर्फ के भंडार में बदलाव को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं, वे किसी एक देश के लिए चेतावनी नहीं हैं। हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र के जलस्रोतों पर निर्भर लगभग दो अरब लोगों के लिए यह भविष्य की सुरक्षा का सवाल है। इसलिए नेपाल की जलप्रलय को केवल नेपाल की त्रासदी कहकर आगे बढ़ जाना आसान होगा, लेकिन सही नहीं। यह घटना हमें तीन बातें एक साथ समझाती है— पहली, प्रकृति के बदलते व्यवहार को नजरअंदाज करना अब महंगा पड़ेगा। दूसरी, विकास की हर परियोजना को जलवायु और आपदा जोखिम की कसौटी पर कसना होगा। तीसरी, हिमालय की सुरक्षा किसी एक देश के बूते की बात नहीं है; इसके लिए क्षेत्रीय सहयोग और साझा वैज्ञानिक व्यवस्था जरूरी है। आखिरकार प्रश्न यह नहीं है कि अगली आपदा कब आएगी। प्रश्न यह है कि अगली आपदा आने से पहले हम कितने तैयार होंगे। क्योंकि बाढ़ को हर बार रोक पाना शायद हमारे हाथ में न हो, ग्लेशियर को एक आदेश देकर पिघलने से रोकना भी संभव नहीं। लेकिन लोगों को समय पर सुरक्षित स्थान तक पहुंचाना, जोखिम वाले क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण रोकना, वैज्ञानिक चेतावनी को गाँव तक पहुंचाना और हिमालय को समझकर विकास करना—यह सब हमारे हाथ में जरूर है और शायद नेपाल की इस त्रासदी से निकलने वाला सबसे बड़ा सबक भी यही है—
आपदा को हमेशा रोका नहीं जा सकता, लेकिन आपदा को जनसंहार बनने से रोका जा सकता है।
शोधार्थी
रुपेश कुमार यादव
राजनीति विज्ञान विभाग
पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here