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क्या कर रहे हैं जेपी आंदोलन से उभरे ये नेता? क्या जनता भी सोई हुई है?

-सत्येंद्र प्रसाद सत्यम, वरिष्ठ पत्रकार
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है… यह नारा देश की दिशा तय कर दी थी। जून 1975 की विशाल सभा में जेपी यानी जय प्रकाश नारायण ने पहली बार ‘सम्पूर्ण क्रांति’ के दो शब्दों का उच्चारण किया था। यह क्रांति उन्होंने बिहार और भारत में फैले भ्रष्टाचार की वजह से शुरू की थी। जन क्रांति का परिणाम यह हुआ कि इंदिरा गांधी की कांग्रेसी सरकार का अंत हो गया और पहली बार देश में गैर कांग्रेसी की सरकार बनी। इन्हीं आंदोलनों से बिहार के कई नेताओं का उदय हुआ। इनमें राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राज्य सभा सदस्य सुशील मोदी एक ही साथ बिहार की राजनीति में उभरे।
इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य ‘भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना आदि प्रमुख था। नई सरकार बनाने के बाद देश में बहुत सारे परिवर्तन हुए।
बिहार में जेपी आंदोलन से उभरे लालू प्रसाद यादव 15 साल सत्ता में रहे। वहीं नीतीश कुमार 16 साल से बिहार की गद्दी संभाले हुए हैं। लगभग इतने ही समय से सुशील मोदी भी सत्ता के साथ हैं। जेपी आंदोलन के ये नेता अपने कार्यकाल में न तो बेरोजगारी की समस्या दूर कर पाए और न ही पूरी तरह से भ्रष्टाचार पर शिकंजा ही कस पाए हैं। शिक्षा का भी हाल दयनीय है। ऐसे में समाजवादी नेता का तदमा ढोना कहां तक सही है। हालांकि बिहार के 31 सालों में आरोप प्रत्यारोप की ही राजनीति चलती रही।
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की सरकार में संसाधन कम थे। केंद्र सरकार से विकास का फंड भी काफी कम मिलता था,लेकिन अब वह बात तो नहीं है। ऐसे में जनता को लालू राज को जंगलराज की संज्ञा देकर जनता को कब तक बेवकूफ बनाया जा सकता है।
अब बात रही नीतीश कुमार जी की सुशासन की। 16 साल से सत्ता में हैं। सड़क और बिजली की समस्या बहुत हद तक दूर हुई है। लेकिन बेरोजगारी अभी भी मुंह बाए खड़ी है। भ्रष्टाचार बेलगाम है, शिक्षा के प्रारंभिक स्तर में सुधार तो है, लेकिन शिक्षा माफियों के कारण मिट्टी पलित हो रही है। इतने सालों में सुशील मोदी लालू परिवार और नीतीश कुमार (एनडीए गठबंधन में आने से पहले) को कोसने में ही समय बर्बाद कर दिए। बिहार को विशेष राज्य के दर्जा पर नीतीश कुमार चुप क्यों हैं?
इन समाजवादी जेपी आंदोलन के नेता बिहार की विकास का दावा करते हैं। लेकिन जिन मानसिकता से इनका उदय हुआ वह कहा चला गया? क्या जनता भी इनके राजनीति प्रपंच में फंसकर रह गई है। क्या जनता भी सोई हुई है?

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