– डॉ परमानन्द लाभ
भीरु था कंस, डरपोक था भारी
आततायी, अहंकारी,हठी तो था हीं
अत्याचारी अनाचारी था कंस
मूर्ख था, थोड़ी समझ नहीं रखता था
सब मिलाकर अव्वल दर्जे का पापी था कंस।
आवाज़ आयी आकाश से
घबरा गया कंस
पिता को कैद किया
बहन-बहनोई को जेल में डाल दिया
कृष्ण के डर से
मासूम सात को मार दिया
पर पता नहीं पा सका
कृष्ण ने जन्म लिया।
फिर सूचना क्या मिली
कृष्ण ने जन्म लिया,
विवेक खो दिया कंस।
डर गया कंस।
थर-थर कांपने लगा कंस,
अपनी बांहों को फड़कने से नहीं रोक सका कंस।
कंस से कहने लगा डर
डरो नहीं कंस,
मैं हाथ झटक मार डालूंगा कृष्ण को कंस।
डरा हुआ कंस,
डर से मिलकर कंस
गंवा दिया राज-पाट,
वैभव सबकुछ
और आज भी मशगूल है
कृष्ण को मारने की तरकीब
ढूंढने में कंस।






















































