गुलमोहर

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एक अनजानी खुशबू फ़िज़ाओं में बिखरी थी
कुछ ख्वाहिशें थीं जो निगाहों के दायरे से गुजरी थीं
ख्वाबों से हसीन थीं
शबनम से जो नाज़ुक थीं
वो तुम्हारी यादें थीं जो
पलकों को छूकर महकी थीं

भीगी पलकों पर चाहत की कलियां महकी थीं
रात के रुखसार पर चांदनी की यादें सिमटी थीं
उठाकर हथेलियों को जब दुआओं में मांगा तुम्हें
सांझ की अबीरी लाली
गुलमोहर की डाली पर उतरी थी


रंजना फतेपुरकर
इंदौर
मो 98930 34331

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