ये कैसी होली हाय रब्बा,
बस कड़वी बोली हाय रब्बा।
हैं साथ मगर कोई बात नहीं,
ना हंसी ठिठोली हाय रब्बा।
तन उजला है मन काला है,
कैसी हमजोली हाय रब्बा।
यह ठीक नहीं यह रीत नहीं,
बिखरी सी टोली हाय रब्बा।
क्यूँ याद नहीं वो बात बड़ी,
पुरखों की बोली हाय रब्बा।
ऐसे रंग में रंग जाएं सभी,
ज्यों दामन-चोली हाय रब्बा।
खिल जाय हृदय हो जाय विकल,
सतरंगी होली हाय रब्बा।
● डॉ. राम प्रेम सिंह निराला
पत्रकार






















































