विश्वविद्यालय संस्कृत एवं दर्शनशास्त्र विभाग तथा डॉ प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा द्वारा एकल व्याख्यान आयोजित।

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‘भारतीय ज्ञान-मीमांसा के विविध आयाम’ विषयक व्याख्यान में 50 से अधिक व्यक्तियों की हुई हाइब्रिड मोड में सहभागिता

दरभंगा, 23 जून, 2026
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग एवं दर्शनशास्त्र विभाग तथा डॉ प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त तत्त्वावधान में पीजी संस्कृत विभाग के सभागार में एकल व्याख्यान आयोजित किया गया। जम्मू केन्द्रीय विश्वविद्यालय, जम्मू-कश्मीर के सह आचार्य डॉ विकास सिंह ने आपने व्याख्यान में कहा कि भारतीय दर्शन में ज्ञान-मीमांसा का विशेष महत्व है, इसलिए इसे दर्शन का अभिन्न अंग माना जाता है। ज्ञान के संबंध में व्यवस्थित चिंतन जो स्वयं ज्ञान को विज्ञान का विषय मानता है, वही ज्ञानमीमांसा कहलाता है। भारतीय दार्शनिक प्रणालियों के विकास के दौरान, ज्ञान-मीमांसा में मीमांसकों की विशेष रुचि बढ़ी और इसने लगभग हर विचारधारा के दार्शनिक विमर्श में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया, क्योंकि दुःख को भारतीय दर्शन में मुख्य समस्या माना जाता है। मानवीय दुःख का मूल कारण अज्ञान है। इसलिए सच्चे ज्ञान के साधनों और प्रक्रियाओं से मनुष्य दुःख रहित और आनंदमय जीवन प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार दर्शन और ज्ञानमीमांसा को परस्पर संबंधित कहा जा सकता है।
अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ कृष्णकान्त झा ने कहा कि भारतीय दर्शन में ज्ञानमीमांसा केवल बौद्धिक या तार्किक विश्लेषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के अंतिम लक्ष्य ‘मोक्ष’ या आत्म-साक्षात्कार से जुड़ी है। अधिकांश दार्शनिक विचारधाराएँ मुख्य रूप से तीन महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान केन्द्रित करती हैं, अर्थात ज्ञान- मीमांसा, सत्तामीमांसा या तत्त्वमीमांसा और नीतिशास्त्र। यहाँ ज्ञान-मीमांसा का अर्थ है- ज्ञान का सिद्धांत। तत्त्वमीमांसा का अर्थ है- वास्तविकता का विज्ञान। नीतिशास्त्र का अर्थ है नैतिक कर्तव्य का पालन। ‘ज्ञान मीमांसा’ शब्द ‘ज्ञान’ और ‘सिद्धांत’ या विज्ञान से मिलकर बना है। यह ज्ञान की प्रकृति और उत्पत्ति का अध्ययन करता है। इसीलिए ‘ज्ञान मीमांसा’ ज्ञान के विज्ञान या सिद्धांत से संबंधित है। इस प्रकार ज्ञान मीमांसा वह सिद्धांत है जो ज्ञान की प्रकृति, परिस्थितियों, कारकों, सीमाओं और उत्पत्ति का अध्ययन करता है। तत्त्वमीमांसा और ज्ञानमीमांसा के संयोजन से सर्वोच्च ज्ञान की प्राप्ति होती है। व्याख्यान में दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ शिखर वासिनी, दर्शनशास्त्र-प्राध्यापक डॉ संजीव कुमार साह मुकेश कुमार झा सहित ऑनलाइन एवं ऑफलाइन मोड में 50 से अधिक व्यक्ति उपस्थित मजूद थे। संचालन डॉ ममता स्नेही, स्वागत डॉ संजीव कुमार साह ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा ने किया।

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