विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग एवं डॉ प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के द्वारा ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और मौसम विज्ञान’ विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित

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भारतीय ज्ञान-परंपरा और मौसम विज्ञान का भारत की प्राचीन संस्कृति, आयुर्वेद, कृषि एवं वर्तमान जीवन शैली से अति गहरा संबंध- प्रो टुन टुन

भारतीय ज्ञान-परम्परा केवल किताबी या बौद्धिक ज्ञान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, ब्रह्मांड और मानव जीवन के बीच एक गहरा संतुलन स्थापित करती है। प्राचीन भारतीय ऋषियों, विचारकों और वैज्ञानिकों ने प्रकृति के नियमों का गहरा अध्ययन किया, जिसका उत्कृष्ट उदाहरण हमारा ऋतुचक्र है जो हमें यह सिखाता है कि मौसम के अनुसार अपने खान-पान, आचरण और जीवनशैली को कैसे ढाला जाए? वेदों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, वेदांग- ज्योतिष में काल गणना, बृहत्संहिता में मौसम एवं वर्षा संबंधी विचार, अर्थशास्त्र में वर्षा मापक और कालिदास के साहित्य में ऋतु एवं मानसून का सजीव चित्रण उपलब्ध है। उक्त बातें विश्वविद्यालय भूगोल विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो टुन टुन झा ‘अचल’ ने लनामिवि, दरभंगा के विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग एवं डॉ प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त तत्त्वावधान में “भारतीय ज्ञान परंपरा और मौसम विज्ञान” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में मुख्य वक्ता के रूप में कही। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और ऋतुओं का संबंध भारत की प्राचीन संस्कृति, आयुर्वेद, कृषि और वर्तमान जीवन शैली से अत्यंत गहरा है। कहा कि पश्चिमी देशों में चार मौसम माने जाते हैं, लेकिन भारतीय ज्ञान प्रणाली और आयुर्वेद, चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में छह ऋतुओं का विभाजन बहुत ही सूक्ष्मता से किया गया है, क्योंकि भारत की भौगोलिक विविधता और मानसूनी हवाएँ वर्ष को इन छह विशिष्ट हिस्सों में बांटती हैं।
अध्यक्षीय संबोधन में संस्कृत के विभागाध्यक्ष डॉ कृष्णकान्त झा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और ऋतुओं का संबंध हमें सिखाता है कि मानव प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि उसका एक हिस्सा है। आधुनिक समय में जब जलवायु परिवर्तन और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं, तब प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा और उसके ऋतु आधारित दृष्टिकोण को अपनाना अत्यंत प्रासंगिक और कल्याणकारी है। कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि मानव के सर्वांगीण विकास, नैतिक चरित्र निर्माण, सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और विश्व कल्याण की भावना विकसित करना है।
अतिथियों का स्वागत एवं विषय प्रवेश कराते हुए सेमिनार के संयोजक डॉ आर एन चौरसिया ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में मौसम, वर्षा, वायु, ऋतुचक्र और जल-प्रबंधन के संबंध में प्रचुर सामग्री उपलब्ध है। यह हमारा प्राचीन, समृद्ध एवं मानवोपयोगी है जो बौद्धिक, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक विरासत का परिचायक है। इसका प्राचीन आधार वेद है। कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने पर विशेष बल दिया गया है। यह हजारों वर्षों से विकसित अनुभव, ज्ञान, चिंतन, जीवन दर्शन एवं व्यवहार का ऐसा व्यापक भंडार है, जिसने भारतीय समाज को दिशा देने के साथ-साथ संपूर्ण विश्व को भी काफी प्रभावित कर रहा है। विकसित भारत- 2047 के सपनों को साकार करने में भारतीय ज्ञान परंपरा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की विरासत और आधुनिक मौसम विज्ञान का विवेकपूर्ण समन्वय कृषि, जल-संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और आपदा प्रबंधन आदि को अधिक प्रभावी बनाने में योगदान दे सकता है। कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को आधुनिक अनुसंधान, तकनीकी विकास, नवाचार, उद्यमिता और कौशल विकास से जोड़कर राष्ट्र- निर्माण की नई संभावनाएं विकसित की जा सकती हैं।
संगोष्ठी में अतिथियों का स्वागत पाग, चादर एवं पुष्प-पौधा से किया गया। वैदिक मंगलाचरण रतीश कुमार झा ने किया, जबकि पौराणिक मंगलाचरण डॉ विजय कुमार मिश्र ने किया। कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ। इस अवसर पर केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली द्वारा आयोजित ओलंपियाड-2026 में बिहार राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त कर गोल्ड मेडल जीतने वाले संस्कृत विभाग के शोधार्थी निशांत कुमार झा को पाक चादर पुष्प पौधा आदि से सम्मानित किया गया। स्नातकोत्तर छात्रा श्वेता शिवानी के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में संस्कृत प्राध्यापिका- डॉ मोना शर्मा, डॉ राम नारायण राय, डॉ मीना कुमारी ब्राह्मणी, डॉ विजय कुमार मिश्र, डॉ मनमोहन झा, डॉ शकुंतला कुमारी, डॉ कुमारी पूनम राय, डॉ शंभू कान्त झा, डॉ विनोदानंद झा, डॉ शकुंतला कुमारी, डॉ चंदन कुमार, डॉ मारुति नंदन भारद्वाज, प्रो उमेश कुमार, एवं डॉ ममता कुमारी, शिक्षिका- डॉ नीतू कुमारी, डॉ मंजरी खरे, डॉ उमेश साफी एवं प्रो लाल कुमार राय, शोधार्थी- नीरज कुमार सिंह, निशांत कुमार झा एवं रितु कुमारी, छात्र- रूपेश, विजय, राजू, शिवानी, नेहा, विजय, कृष्ण, अरुणिमा, निशा, जितेन्द्र, आदित्य, अनिल, राहुल, दयानंद, गजेन्द्र, कन्हैया, रोशन, स्मिता, पूजा, मुकेश, मितेश, केशव, सुधा, हेमा, अस्मिता, कल्पना, श्वेता, कर्मी- मंजू अकेला, योगेन्द्र पासवान एवं उदय कुमार उदेश सहित 65 से अधिक व्यक्ति उपस्थित थे।

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