कवि सम्मेलन कल और आज ।

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आज का कवि सम्मेलन निपटाऊ कवि सम्मेलन हो गया है । इसे गंभीरता के साथ नहीं लिया जा रहा । रातो- रात शोहरत और पैसे की चाह ,ललक से कवि पैदा हो रहे हैं और कविता उत्पादन की वस्तु बना मान कर इसे उत्पादित करने लगे हैं । यही वजह है कि आज की कविता से भाव , रस छंद अलंकार ,शिल्प गायब है सिर्फ बीच का धड़ बचा है । सिर और पाँव गायब है । इसी धड़ के सहारे कवि उछल कूद मचा रहे हैं । कुछ समय लगा लोगों को समझने में कि कवि गण कह क्या रहे हैं ? बाद में उन्हें पता चला कि पूरे समय कवि ताली ही बजवाता रहा और चुटकुलों की सहारे पर चलता रहा ।
लोग अब इसे नकारने लगे हैं और यही कारण है कि अब वह भीड़ नहीं होती जो होनी चाहिए । अब भीड़ दिखाने के लिए जलपान की व्यवस्था से कुछ अपने लोगों को बुलाया जा रहा है । कवि बनना सबके बस की बात नहीं होती यह सब जानते हैं कि यह गुण ईश्वर की विशेष कृपा से होती है पर आज हर दूसरा वंदा
कवि है । वह ले आता है कहीं से कविता और उसका वाचन कर बड़ा कवि बन जाता है । मैं यह दावे के साथ कह रही हूँ कुछ लोग वास्तव में बढ़िया लिख रहे हैं बाकी लोग उनके दम पर शब्द गढ़ रहे हैं अर्थात पूरी दुनिया जोड़ तोड़ में लगी है । मौलिक होना लोग पसंद नहीं कर रहे ,संघर्ष नहीं कर रहे बस घंटे भर में रचना गढ़ ले रहे हैं । उन्हें वाह वाह से मतलब है । लोग भी वाह वाह में लगे हैं मैं खुद भी वाह वाह कर देती हूँ । इसी वाह वाह की चाहत पर मैं कुछ लिखी थी उदाहरण दे रही हूँ ……

साहित्य अखाड़े खड़े ,बड़े धुरंधर वीर ।
दाँव-दाँव दें पटखनी ,पकड़े अपना धीर ।।1

लिखते ही नित जा रहे ,बड़े-बड़े लिख्खाड़ ।
कविता पर कविता धरे ,लेप रहे हैं माड़ ।।2

कविता चुटकी खेल भर ,पल भर में तैयार ।
नहीं शिल्प का ज्ञान अब ,करें शब्द व्यवहार ।।3

            शुध्द साहित्यिक कविता जब मंच से पढ़ी जाती है तो लोगों में उसी प्रकार के भाव संचार होते हैं । ताली बजवानी नहीं पड़ती बल्कि खुद ब खुद लोग तालियाँ बजाने लगते हैं । बहुत से साहित्यिक मंच हैं जो प्रेम ,सौन्दर्य ,और विरह , हास्य ,वीर ,राष्ट्रीय गीत ,ग़ज़ल

दोहा , सोरठा ,घनाक्षरी पर जोर दे रहे हैं और प्रस्तुत करवा रहे हैं इनकी समाप्ति नहीं है बल्कि कम हो गए हैं । पहले जमाने के कवि साहित्य प्रस्तुत करते और लोग उसे खूब समझते भी थे । उनके आनंद की अनुभूति वर्षों उनपे छाई रहती थी वे उन रचनाओं को गुनगुनाते भी रहते थे । उन रचनाओं से दर्शक को सहारा भी मिलता था और प्रोत्साहन भी साथ में आनंद भी । आज तो समझ ही नहीं पाते कि सुना क्या है ?
मैं यही सब फर्क देख रही हूँ कल और आज के कविताओं और कवि सम्मेलन में । यह द्रेड बदलना ही चाहिए । कवि के लिए भी चैलेंज है कि बिगड़े वातावरण में फिर से उसे कैसे स्थापित होना है और कैसे दर्शक को बांधना है । साहित्यकारों को इसपे अवश्य ही गंभीर चिंतन करने की आवश्यकता है । इस बड़े ही गंभीर और चिंतनीय विषय को हर किसी को उठाना चाहिए । यह चिंता किसी राष्ट्रीय चिंतन से कम नहीं है । सृजन शक्ति ही जागरूक समाज निर्माण करती है । इसकी दिशा और दशा पर विचार सबको मिलकर करना चाहिए ।

प्रोफेसर ,डा. सुनीता सिंह ‘सुधा’
शिक्षाविद ,साहित्यकार , कवयित्री ,लेखिका
वाराणसी

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