राजभाषा हिंदी दिवस पर विश्वभारती में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ

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संजय भारती

राजभाषा हिंदी दिवस के अवसर पर विश्वभारती में राष्ट्रीय संगोष्ठियों के आयोजन की एक समृद्ध एवं गौरवपूर्ण परंपरा रही है। इसी परंपरा को और अधिक व्यापक एवं सार्थक स्वरूप प्रदान करते हुए माननीय कुलपति महोदय की सदिच्छा एवं प्रेरणा से इस वर्ष विश्वभारती में 4 से 18 सितंबर, 2026 तक हिंदी पखवाड़ा आयोजित किया जा रहा है। इसी क्रम में राजभाषा प्रकोष्ठ, हिंदी विभाग, पाठ भवन एवं शिक्षा-सत्र, विश्वभारती, शांतिनिकेतन के संयुक्त तत्त्वावधान में 14-15 सितंबर, 2026 को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय था- “राजभाषा हिंदी : अतीत, वर्तमान और भविष्य”। दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन अवसर पर हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. जगदीश भगत ने राजभाषा हिंदी की उपादेयता एवं समकालीन महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए सभी आगत अतिथियों एवं प्रतिभागियों का हार्दिक स्वागत किया।
संगोष्ठी का विधिवत उद्घाटन विश्वभारती के कुलपति डॉ. प्रवीण कुमार घोष ने किया। अपने वक्तव्य में कुलपति ने कहा कि “हिंदी हमें एकता के सूत्र में बाँधती है।” उन्होंने हिंदी के सहज, स्वाभाविक एवं निर्भीक प्रयोग पर बल देते हुए कहा कि कोई भी भाषा निरंतर प्रयोग से ही विकसित और समृद्ध होती है। अतः हिंदी के प्रयोग में झिझकने या अटकने के बजाय हमें आत्मविश्वास के साथ उसका अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए। भाषा भवन के अध्यक्ष प्रो. मृणाल कांति मंडल ने कहा कि हिंदी भारत के व्यापक भूभाग में समझी और बोली जाती है। इसकी व्यापक स्वीकार्यता, जनसंपर्क की क्षमता और विविध समुदायों के बीच संवाद स्थापित करने की शक्ति ही इसे विशिष्ट बनाती है। राजभाषा प्रकोष्ठ की ओर से प्रो. मुक्तेश्वर नाथ तिवारी ने राजभाषा हिंदी दिवस के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विश्वभारती में हिंदी के प्रयोग एवं उसकी स्थिति को रेखांकित किया। डॉ. सुभाष चंद्र राय ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी की संस्कृति मूलतः सामासिक एवं समन्वयकारी है, जिसमें भारत की विविध भाषाई और सांस्कृतिक परंपराओं का सुंदर समावेश दिखाई देता है। अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पधारे डॉ. अभिलाष कुमार गोंड ने हिंदी को बंधुत्व, आत्मीयता और सामाजिक सद्भाव की भाषा बताते हुए कहा कि हिंदी विभिन्न समुदायों और संस्कृतियों को जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य करती है। वर्धमान विश्वविद्यालय से आए डॉ. शशि कुमार शर्मा ने भारतेंदु हरिश्चंद्र का स्मरण करते हुए कहा कि “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल” की भावना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। डॉ. श्रुति कुमुद ने सिनेमाई जगत में हिंदी की स्थिति और उसकी व्यापक उपस्थिति पर प्रकाश डाला। वहीं, दीनबंधु कॉलेज, हावड़ा से पधारे डॉ. सत्य प्रकाश तिवारी ने हिंदी के भविष्योन्मुखी स्वरूप तथा उसके व्यावहारिक अनुप्रयोगों पर अपने विचार व्यक्त किए। डॉ. राहुल सिंह ने कहा कि हिंदी केवल संवाद की भाषा ही नहीं है, बल्कि ज्ञान, तकनीक, मीडिया और रोजगार सहित अनेक क्षेत्रों में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है।
संगोष्ठी का एक विशेष सत्र अहिंदी भाषी प्रतिभागियों को केंद्र में रखकर आयोजित किया गया। इस सत्र में विश्वभारती के विभिन्न विभागों से जुड़े कर्मियों एवं अध्यापकों ने हिंदी के संबंध में अपने अनुभव और विचार साझा किए। इस अवसर पर उत्तम कुमार दास, डॉ. शुभ्रज्योति, डॉ. सोमी मंडल, डॉ. दुखिया मुर्मू, डॉ. मानवेन्द्र साहा, डॉ. विष्णु पद पाल सहित अनेक विद्वानों ने हिंदी के प्रति अपनी आत्मीयता व्यक्त करते हुए उसके व्यापक प्रयोग एवं प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. संजय घोष ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि “हिंदी का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है।” उन्होंने हिंदी की निरंतर बढ़ती स्वीकार्यता, व्यापक संभावनाओं और बदलते वैश्विक परिदृश्य में उसके बढ़ते महत्त्व को रेखांकित किया। संगोष्ठी के प्रथम दिवस की संध्या सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम रही। सांस्कृतिक संध्या में संगीत भवन के अध्यापक डॉ. मनोज शर्मा ने अपने सितार वादन की मनमोहक संगीत प्रस्तुति से उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके अतिरिक्त हिंदी भवन एवं पाठ भवन के विद्यार्थियों ने भी अपनी आकर्षक एवं प्रभावशाली सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। गीत-संगीत और विविध सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों से सजी इस संध्या ने उपस्थित अतिथियों एवं प्रतिभागियों को भावविभोर कर दिया।
दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम दिवस के आयोजन में विश्वभारती के अध्यापक, कर्मी, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। विद्वानों के विचारोत्तेजक वक्तव्यों, सार्थक संवादों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से सुसज्जित संगोष्ठी का प्रथम दिवस राजभाषा हिंदी की ऐतिहासिक यात्रा, वर्तमान स्वरूप और भावी संभावनाओं पर गंभीर एवं उपयोगी विमर्श का सशक्त मंच बनकर उभरा।

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