200 स्वयंसेवकों को चार ग्रुपों में बांट कर सीपीआर, रक्त स्राव नियंत्रण, खपची बांधना, लिफ्टिंग एवं मूविंग तथा शारीरिक परीक्षण का हुआ प्रायोगिक अभ्यास
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के राष्ट्रीय सेवा योजना कोषांग द्वारा बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्रबंधन प्राधिकरण, पटना के सौजन्य से विश्वविद्यालय परिसर स्थित जुबिली हॉल एवं पास के मैदानों में दरभंगा, मधुबनी एवं समस्तीपुर के 200 स्वयंसेवकों का सात दिवसीय ”युवा आपदा मित्र आवासीय प्रशिक्षण शिविर” चौथे दिन जारी रहा, जिसमें संयोजक डॉ आर एन चौरसिया, पीजी के कार्यक्रम पदाधिकारी डॉ सोनू राम शंकर, लूटन झा कॉलेज, ननौर, मधुबनी के एनएसएस पदाधिकारी डॉ दिलीप कुमार झा, मणिकांत ठाकुर, मुकेश कुमार झा, अक्षय कुमार झा, समरेश कुमार, अमित कुमार झा, विकास कुमार, प्रशांत कुमार, सुमित कुमार, रवीन्द्र कुमार सिंह आदि ने सक्रिय योगदान किया। इस अवसर पर एसडीआरएफ बिहटा, पटना के प्रशिक्षक- रूपेश कुमार पासवान, पंकज कुमार, राजू कुमार, संतोष कुमार, प्रभु कुमार, सच्चिदानंद कुमार, मिथिलेश तिवारी, पूजा कुमारी एवं प्रीति कुमारी ने विशेष प्रशिक्षण दिया। शिविर का शुभारंभ राष्ट्रगीत एवं एनएसएस लक्ष्य-गीत से, जबकि समापन राष्ट्रगान से हुआ। वहीं प्रातः काल में पीटी, योग एवं प्राणायाम के बाद आपदा ड्रेस, ट्रैक शूज, रस्सी एवं ट्रैक सूट आदि स्वयंसेवकों को प्रदान किए गए।
प्रशिक्षण के प्रथम सत्र में रूपेश कुमार पासवान ने आग लगने की घटना एवं उससे संबंधित मॉक ड्रिल की जानकारी देते हुए कहा कि आग लगने के प्रमुख कारणों में मानवीय लापरवाही, गैस रिसाव एवं विद्युत खराबी आदि हैं। बचाव के लिए फायर अलार्म, अग्निशमन यंत्र, सुरक्षित वायरिंग एवं जागरूकता प्रमुख हैं। उन्होंने आग की संरचना, यह कैसे लगती है, इसका क्या प्रभाव पड़ता है तथा इसके प्रभाव को कम से कम कैसे किया जा सकता है आदि की पूर्ण एवं विस्तृत जानकारी दी। आग के लिए ईंधन, ऑक्सीजन एवं ऊष्मा जरूरी है, जिनमें से किसी एक को हटाकर आग रोकी जा सकती है। उन्होंने शरीर के अंगों के जल जाने पर बरतने वाली सावधानियां को बताते हुए कहा कि गंभीर जलन में प्राथमिक उपचार करते हुए तुरंत चिकित्सक के पास ले जाना चाहिए। यदि कपड़ों में आग लगी हो तो “रूकें, लेटें और लुढ़कें” की नीति अपनाना चाहिए।
अगले सत्र में प्रशिक्षक संतोष कुमार ने सड़क दुर्घटना की जानकारी देते हुए कहा कि यह मानव जनित दुर्घटना है, जिसमें व्यक्ति घायल हो सकते हैं या उनकी मृत्यु भी हो सकती है। उन्होंने सड़कों पर लगे माइल स्टोनों के विभिन्न रंगों एवं उसके अर्थों को बताते हुए कहा कि यदि दुर्घटनाग्रस्त व्यक्तियों को अन्य राहगीर गोल्डन आवर अर्थात शुरुआती 1 घंटे के अंदर अस्पताल पहुंचा दे तो 50% मृत्यु रूक सकती है। कहा कि आंकड़ों के अनुसार 195 देशों में सड़क दुर्घटना की दृष्टि से भारत प्रथम स्थान पर है। विश्व की 10% सड़क दुर्घटनाएं सिर्फ भारत में होती हैं, जिनमें 18 से 45 आयु वर्ष के लोग सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। भारत में हर वर्ष 1,50,000 से अधिक मृत्यु सिर्फ सड़क दुर्घटना में होती है, जिनमें दोपहिया वाहन से सर्वाधिक मृत्यु होती है। कहा कि भारत में प्रतिदिन 1,264 सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, जिनमें करीब 462 व्यक्तियों की मृत्यु हो जाती है।
भोजनोप्रांत 50-50 की संख्या में स्वयंसेवकों की सती में बनाई गई, जिन्हें सीपीआर, दुर्घटनोप्रांत रक्त स्राव रोकने की विधि, टूटी हुई हड्डियों पर खपची बांधना, घायल व्यक्ति का लिफ्टिंग एवं मूविंग तथा शारीरिक प्रशिक्षण का गहन पूर्व अभ्यास कराया गया। अंतिम सत्र में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें छात्र-छात्राओं गाना, नृत्य, एकांकी, कविता पाठ एवं प्रेरक कहानियों के माध्यम से बढ़-कर कर हिस्सा लिया।





















































