विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग एवं डॉ प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त तत्त्वावधान में राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित।

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‘संस्कृत वाङ्मय में पर्यावरण चिन्तन’ विषय पर डॉ विनय, डॉ कृष्णकान्त, डॉ शिखर वासिनी, डॉ चौरसिया, मुकेश झा ने रखे विचार

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग एवं डॉ प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त तत्त्वावधान में “संस्कृत वाङ्मय में पर्यावरण चिन्तन” विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन पीजी संस्कृत विभाग में किया गया, जिसमें संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ कृष्णकान्त झा- अध्यक्ष, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व वेद विभागाध्यक्ष डॉ विनय कुमार मिश्र- मुख्य वक्ता, दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्षा डॉ शिखर वासिनी- विशिष्ट वक्ता, सेमिनार के संयोजक डॉ आर एन चौरसिया- विषय प्रवेशक एवं स्वागत कर्ता, फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा- धन्यवाद कर्ता एवं रोशन कुमार- संचालन कर्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त किये। संगोष्ठी में भूगोल-प्राध्यापक डॉ मनु राज शर्मा एवं डॉ रश्मि शिखा, अनिल कुमार सिंह, रीतु, मंजू आदि सहित 50 से अधिक व्यक्ति उपस्थित थे। सेमिनार का प्रारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन से, जबकि समापन राष्ट्रगान से हुआ।
डॉ विनय कुमार मिश्र ने संस्कृत वाङ्मय के महत्व की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति ने प्रकृति में देवत्व का भाव व्यक्त किया है। आकाश, वायु, अग्नि, जल, और पृथ्वी- इन पञ्च महाभूतों से पर्यावरण तथा हमारे शरीर का निर्माण होता है, जिनमें सदा संतुलन रहना अनिवार्य है। यदि हम प्रकृति की रक्षा करेंगे तो प्रकृति भी सदा हमारी रक्षा करेगी, क्योंकि प्रकृति स्वयं दैवीय शक्ति से परिपूर्ण है। डॉ कृष्णकान्त झा ने कहा कि संस्कृत वाङ्मय में वृक्षों को जीवन दाता एवं लोक कल्याणकारी माना गया है।कहा कि वेदों में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, वनस्पति और जीव-जगत के प्रति आदर भाव व्यक्त किया गया है। संस्कृत काव्य में मानव और प्रकृति के बीच आत्मीय संबंध दिखाई पड़ता है।
डॉ आर एन चौरसिया ने कहा कि संस्कृत वाङ्मय में पर्यावरण को मानव जीवन का मूल आधार माना गया है, जिसमें पर्यावरण चिन्तन प्रकृति और मानव के गहरे संबंध को दर्शाता है। इसमें पर्यावरण के प्रति अत्यंत संवेदनशील एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण देखने को मिलता है। यह चिन्तन आधुनिक काल में पर्यावरण संरक्षण की बड़ी प्रेरणा है। वृक्ष पृथ्वी के फेफड़े हैं जो प्राणवायु आक्सीजन प्रदान करते हैं। कहा कि भागवत पुराण में प्रकृति को ईश्वर का रूप माना गया है। डॉ शिखर वासिनी ने कहा कि पंचभूतों- धरती, जल, वायु, अग्नि एवं आकाश की रक्षा करना मानव का परम कर्तव्य है। इनके महत्त्वों को जानकर ही प्रकृति को धर्म से जोड़ा गया है।

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