करोना के बीच चुनाव, बिहार की राजनैतिक स्थिति और मिजाज पर विशेष-

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✍️अपर्णा मिश्रा उत्तर प्रदेश
✍️ सम्पादकीय

 यह सही है कि लोकतंत्र राजनीति की धुरी पर टिकी हुई है और राजनीति चुनाव की बैशाखी पर टिकी है।राजनीति जनतांत्रिक व्यवस्था का मुख्य अंग होती है जिसके सहारे जनता की अपनी सरकार का गठन करती है।लोकतंत्र में चुनाव बहुमत के आधार होता है और बहुमत वाली राजनैतिक पार्टी सरकार का गठन करने का अधिकार रखती है।राजनीति में बहुमत से चुना जाने वाला प्रतिनिधि ही जनता का रहनुमा होता है और उसकी बात को जनता की आवाज माना जाता है।यही कारण है कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि माननीय होता है और उसे विशेष अधिकार प्रदान होते हैं।जनतांत्रिक व्यवस्था में जनता का समर्थन हासिल करने के लिए जनता का दिल जीतना पड़ता है।लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता रूपी मतदाता भगवान का समर्थन स्वच्छ विकासशील छबि से हासिल करने की व्यवस्था है लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि लोकतंत्र के गठन के बाद से ही मतदाता का दिल जीतकर उसका समर्थन हासिल करने का तरीका व स्वच्छ विकासशील न रहकर जातिवाद धर्म सम्प्रदाय क्षेत्रवाद एवं गुण्डागर्दी में बदल गया है।राजनीति में स्वच्छ छबि वाले बाहुबलियों जाति, धर्म, सम्प्रदाय वालों के सामने असहाय साबित होने लगे हैं।इस समय देश कोरोना महामारी जैसी वैश्विक महामारी की चपेट में है और इससे बचाव के नाम पर समाजिक दूरी बनाए रखने का सहारा लिया जा रहा है।एक तरफ तो कोरोना महामारी से  बचाव के लिये लाकडाउन लगाकर सभी समाजिक गतिविधियों को प्रतिबंधित कर दिया गया है जिससे आम आदमी फुटपाथ पर आकर कंगाल बन गया है दूसरी तरफ राजनीति के चलते विभिन्न शहरों प्रांतों में रहने वाले प्रवासी लोगों को बस रोडवेज रेल हवाई जहाज ट्रक मेटाडोर पैदल आदि से लाकर उन्हें गाँव गली मुहल्ले तक पहुंचाकर कोरोना को पैर फैलाने का अवसर दे दिया गया।मंदिर मस्जिद पर भीड़ इकट्ठा होने पर रोक लगा दी गई है तो दूसरी तरफ मदिरालयों रेलवे स्टेशनों एवं राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए भीड़ एकत्र होने की छूट दे दी गई है।इतना ही नहीं कोरोना के नाम पर भारतीय संस्कृति को बदल दिया गया और दो गज की दूरी तथा मुंह पर मास्क रूपी पट्टी बांधने पर विवश कर दिया गया है।कोरोना के नाम एक तरफ सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराया जा रहा है तो दूसरी तरफ राजनैतिक रोटियां सेंककर चुनाव जीतने के लिए राजनैतिक दलों द्वारा जनसम्पर्क व जनसभाएं करने की छूट दे दी गई है।इसी बीच बिहार में चुनाव कराये जा रहे हैं और राजनैतिक महासमर हो रहा है।सभी दल खुलेआम कोरोना को भूलकर मास्क बांधकर चुनावी सभाओं का आयोजन कर बिना मास्क वाले मतदाता भगवान को रिझाने में जुटे हैं।चुनाव में भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ विकास, राम मंदिर, काश्मीर से धारा तीन सत्तर हटाने, एअर स्ट्राइक एवं कानून का राज कायम करने तथा सरकार बनने पर मुफ्त कोरोना वैक्सीन देने के वायदे के नाम पर भाग्य आजमाइश कर रही तो विपक्षी लालूप्रसाद यादव की लालटेन के उजाले में यादव एवं मुसलमानों के साथ जातीय एवं धर्म साम्प्रदायिक गठबंधन के सहारे जनता का दिल जीतकर सरकार बनाने की जुगत में जुटी है।कांग्रेस इन दोनों को भ्रष्टाचारी देशद्रोही साम्प्रदायिक जातिवादी बताकर देश को एकता के सूत्र में बांधकर विकास की गंगा बहाने के सहारे बिहारियों को रिझाने में जुटी है तो अपने को मुसलमानों का एकमात्र हितैषी बताकर ओवसी की पार्टी मुस्लिम मतदाताओं को लुभाकर अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हैं तो भाजपा के एक सहयोगी स्तम्भ दलितों के नेता माने जाने वाले स्व० राम विलास पासवान के सुपुत्र चिराग पासवान  पिता की जगह उनकी मशाल बुलंद कर  दलितों का मसीहा साबित कर चुनावी वैतरणी पार करने में जुटे हैं।सभी जानते हैं कि बिहार नक्सल प्रभावित गरीबी बेरोजगारी हिंसा का दंश झेल रहे बिहार की राजनीति में कर्पूरी ठाकुर, जगन्नाथ मिश्र के साथ ही अस्सी के दशक के बाद लालू प्रसाद यादव नीतीश, रामविलास पासवान जैसे राजनेताओं की जाति धर्म सम्प्रदाय का बंटवारा करवा कर मतदाताओं का समर्थन हासिल करने में जुटी है।यहाँ की राजनीति एवं मतदाताओं की रूझान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ पर भाजपा को नीतीश कुमार जैसे जातीय गणित के बल पर भाजपा के सत्ता पर अभी विराजमान हैं। बिहार में यह पहला चुनाव है जबकि लालूप्रसाद यादव एवं रामविलास पासवान  चुनाव हलचल में शामिल नहीं है।प्रधानमंत्री मोदी जी दर्जनों जनसभाओं को संबोधित करने का मतलब है कि चुनाव में विपक्ष शक्तिशाली लग रहा है।जबतक रहेगा समोसे में आलू तबतक रहेगा लालू के नारे वाले  विभिन्न मन मिजाज वाले बिहार के मतदाता भगवान चुनाव में किसे पांच साल के लिये अपना मत देकर भाग्य विधाता चुनते हैं इसे मतदाता भगवान ही जान सकते हैं।बिहार के चुनाव में बदनाम इलेक्ट्रिक मीडिया सक्रिय भूमिका निभाकर अनुमति भविष्यवाणी कर रही है।इस समय इलेक्ट्रॉनिक  मीडिया पर सत्ता समर्थक होने का आरोप लगाकर गोदी मीडिया कहा जाने लगा है।

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