आधुनिक लोकतंत्र, संविधान और वैश्विक व्यवस्था पर गहन विमर्श

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पटना…

लोकतंत्र की बदलती प्रकृति, वैश्वीकरण की चुनौतियाँ, भारतीय कल्याण दृष्टि और समकालीन अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर गंभीर बौद्धिक विमर्श के उद्देश्य से पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय, पटना के अनुग्रह नारायण सिंह महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा महाविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय सभागार में आयोजित दो दिवसीय व्याख्यानमाला के दूसरे दिन “आधुनिक लोकतंत्र की नैतिक दुविधाएँ: कल्याण के भारतीय परिप्रेक्ष्य का अन्वेषण” एवं समकालीन अंतरराष्ट्रीय मुद्दों विषय पर उच्चस्तरीय अकादमिक संवाद आयोजित किया गया। कार्यक्रम में शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उल्लेखनीय भागीदारी रही।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। ज्ञान, विवेक और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रतीक दीप की ज्योति के साथ सभागार में बौद्धिक ऊर्जा का वातावरण निर्मित हुआ। पूरे आयोजन के दौरान लोकतंत्र, संविधान, वैश्विक राजनीति और भारतीय चिंतन पर गंभीर एवं तथ्यपरक विमर्श चलता रहा।

मुख्य वक्ता डॉ. विजय वर्मा (दयाल सिंह महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने अपने संबोधन में सामाजिक संबंधों की यथार्थवादी व्याख्या करते हुए कहा, “दुनिया का हर संबंध औकात और जरूरत का संबंध होता है।” उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संबंधों की प्रकृति तेजी से बदल रही है। लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, नैतिक उत्तरदायित्व, आर्थिक समानता और मानवीय गरिमा के संरक्षण के रूप में समझना होगा।

अपने उद्बोधन में प्रो. रवि रंजन (जाकिर हुसैन महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर विचार रखते हुए कहा, “बेहतर संविधान भी बेकार चल सकता है और बेकार संविधान से भी बेहतर शासन संभव हो सकता है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति संविधान की धाराओं से अधिक उसे संचालित करने वाले नागरिकों, राजनीतिक नेतृत्व और संस्थाओं की कार्यसंस्कृति तथा नैतिक प्रतिबद्धता में निहित होती है।

व्याख्यानमाला में वैश्वीकरण के बाद उभरते आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य, ट्रेड यूनियनों की बदलती भूमिका, पुनः निजीकरण , मध्यवर्ग का विस्तार, लोकतंत्र की नई अवधारणा, स्वतंत्रता, समानता, आधुनिकता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, रोजगार, आर्थिक विकास, वैश्विक व्यापार के नए केंद्र तथा राजनीतिक विज्ञान की बदलती प्रकृति पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि राजनीतिक विज्ञान केवल सत्ता और शासन का अध्ययन नहीं, बल्कि मानव इतिहास, समाज, अर्थव्यवस्था और सभ्यता के विकास को समझने वाला व्यापक अनुशासन है।

प्रश्नोत्तर सत्र में पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के शोधार्थी रुपेश कुमार यादव, अमन, अभिषेक सहित अनेक विद्यार्थियों ने लोकतंत्र, संविधान, वैश्विक राजनीति और समकालीन अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से जुड़े विचारोत्तेजक प्रश्न रखे, जिनका मंचासीन विद्वानों ने विस्तारपूर्वक उत्तर दिया।

इस अवसर पर राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. बिनोद कुमार झा, विभागीय सहायक प्राध्यापक डॉ. मुकेश कुमार, डॉ. रिचा गौतम एवं कौशर सहित विभाग के शिक्षक उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के दौरान शोधार्थी रुपेश कुमार यादव ने विभागाध्यक्ष प्रो. बिनोद कुमार झा से आग्रह किया कि इस प्रकार की ज्ञानपरक व्याख्यानमालाओं और भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित बौद्धिक कार्यक्रमों का नियमित आयोजन किया जाना चाहिए, ताकि शोधार्थियों और विद्यार्थियों को समकालीन राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विमर्श से निरंतर जुड़ने का अवसर मिलता रहे। इस पर विभागाध्यक्ष प्रो. बिनोद कुमार झा ने सकारात्मक सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि राजनीति विज्ञान विभाग भविष्य में भी इस प्रकार की व्याख्यानमालाओं, संवाद श्रृंखलाओं और अकादमिक कार्यक्रमों का नियमित आयोजन करता रहेगा।

महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. रत्ना अमृत ने अपने संदेश में कहा कि “उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन, संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता, नैतिक दृष्टि और वैश्विक परिप्रेक्ष्य विकसित करना है। इस प्रकार के बौद्धिक आयोजन विद्यार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान से आगे बढ़कर समकालीन चुनौतियों को समझने और समाज के प्रति उत्तरदायी नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं।” उन्होंने राजनीति विज्ञान विभाग की इस पहल की सराहना करते हुए भविष्य में भी ऐसे आयोजनों को संस्थागत स्तर पर निरंतर प्रोत्साहन देने की बात कही।

कार्यक्रम के अंत में अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। इसके उपरांत राष्ट्रगान के सामूहिक गायन के साथ कार्यक्रम का गरिमामय समापन हुआ।

यह व्याख्यानमाला केवल एक शैक्षणिक आयोजन नहीं रही, बल्कि लोकतंत्र, संविधान, भारतीय ज्ञान परंपरा और समकालीन वैश्विक चुनौतियों के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बौद्धिक पहल के रूप में उभरी। विशेषज्ञों का मत था कि ऐसे विमर्श उच्च शिक्षा संस्थानों में लोकतांत्रिक चेतना, शोध संस्कृति और वैचारिक समृद्धि को नई दिशा प्रदान करते हैं।

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