— डॉ परमानन्दलाभ
कवि हूं मैं
कविता की रचना धर्म है मेरा
पर कुछ नहीं लिख सका
कभी तुम्हारे लिए।
मत समझना तुम कि मैंने भुला दिया
निभाना, जो धर्म है मेरा
मन में भाव कलम में स्याही
थी मगर, पर कुछ नहीं लिख सका कभी तुम्हारे लिए।
लड़ा खूब अपनों से मन-ही-मन
तेरे मोहते आनन वो चंचल नयन
जुलुम ढाती मुस्की को शब्दों में सजाने की
लालसा थी बड़ी ,
पर कुछ नहीं लिख सका कभी तुम्हारे लिए।
मेरी कविता के हर पद गुदगुदाते जो रहते ,
जिंदगी भर तुम्हें हंसाते जो रहते ,
कविता के संग, उफ् मेरे साथ रहती,
पर कुछ नहीं लिख सका कभी तुम्हारे लिए।
यदि मेरी रचना में तेरी फोटो जो होती
मैं ढूढ़ लेता उसे, आवाज दे कर बुला लेता तुम्हें
मिल लेता अपनी कविता में प्रिये,
सुख मिलता अपार उसमें प्रिये,
पर कुछ नहीं लिख सका कभी तुम्हारे लिए।
तू जाने-न-जाने या माने-न-माने
सच है यही, लेकर अरमां बैठा दफे कई
मसि कागद वो कलम लेकर सही
कविता ही क्यों, रच दूंगा ग्रंथ अभी
और तेरे हाथों में दूंगा प्रेमोपहार अभी ,
पर कुछ नहीं लिख सका कभी तुम्हारे लिए।
क्या कहूं अब मैं ‘तुमसे प्रिये
होती यदि आज सामने तू
कहे बिना मेरी विवशता समझ जाती जो तू
पर कुछ नहीं लिख सका कभी तुम्हारे लिए।
मेरे ऊहापोह संशय के बीच
खो गया मेरा ख्वाब, सौख-कल्पना मेरी
धरी रह गई मुरादें, जली अरमां की चिताएं
‘लाभ ‘रचता कौन-सी कविता तुम्हारे लिए,
इसीलिए तो कहता हूं, कवि हूं,
पर कुछ लिख नहीं सका कभी तुम्हारे लिए।।





















































