मुझे पसंद हैं,
बिन वैशाखी की महिलाएँ
अपनी पसंद का नाश्ता बनाती,
स्कूटी में चाभी घूमाती ,
हल्के , गहरे लिपस्टिक की शेड्स चुनती
पति को नाम से पुकारती,
अकेले बच्चों की माँ -पिता बन जाती
मुझे पसंद है
बिन वैशाखी वाली महिलाएँ
घर -ऑफिस, बाजार सब,
अकेले नापती
मायके -ससुराल हर रिश्ते को,
दिल से निभाती, दुलारती
बॉस , माँ, और बहू,
कई किरदार में खुद को ढालती,
मुझे पसंद हैं, बिन
वैशाखी वाली महिलाएँ
कौन हैं ये महिलाएँ??
ये कल की पीढ़ी का अगला अध्याय है
जो सब से अंत में खाती थी, बासी रोटियांँ
सब्जी की बची खुर्चन और नमक मिर्च तेल के साथ
जो अहले सुबह जगती थी, सबसे अंत में सोती थी,
पिसती थी चक्की में गेंहू, और धीरे -धीरे खुद को भी,
जो सुनती थी कि वो कुछ कमाती नहीं,
दबी जबान में बात करना औरत का गहना है सिखाकर,
एक दिन जिसका गला दबा दिया जाता था,
जो अहंकारी पुरुष के बच्चों को जन्म देने, और माँ – बाप की
सेवा करने की मशीन भर थी,
जिसके पास जहर खाने तक के पैसे नहीं होते थे,
उन्ही महिलाओं ने जन्म दिया है,
इन बिन वैशाखी की महिलाओं को,
जो सत्कार भी जानती हैं, संस्कार भी जानती हैं
उपकार भी जानती हैं,
जरुरत पड़े तो संहार भी जानती हैं
शायद इसलिए पसंद हैं, मुझे,
बिन वैशाखी की महिलाएँ
मनीषा





















































