मुक्तिनाथ*

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     मुक्तिनाथ जोर-जोर से चिल्ला कर रो रहे थे । फिर कुछ देर बाद शांत हो गए । उन्हें अब यह लग रहा था कि वे अपने नाम के अनुरूप हो गए। सब उन्हें छोड़ गए और वे सबसे मुक्त हो गए । सबको उनसे परेशानी थी और उन्हें सबसे परेशानी थी। वे कबीर तो बहुत पहले ही बन गए होते पर परिवार का जंजाल जो सर पर था।
           गरीबी ऐसी झेली जो किसी ने न झेली होगी ।पैसे-पैसे को तरसे । कोई इच्छा पूरी न हुई और न पढ़ाई ही पूरी हुई । वे शहर जाना चाहते थे । पहाड़ पर जाना चाहते थे पर पिता जी के मरते ही उनके दादा जी ने उनकी पढ़ाई छुड़ाकर उन्हें विवाह के बंधन में बाँध दिया । मैट्रिक बस पास हो पाये थे । उम्र सोलह बरस । पत्नी मनोरमा समझदार थी जो मुक्तिनाथ के साथ-साथ खेत और घर में सहयोग देती थी। 
          मुक्तिनाथ के अंदर साहित्य का बीज उनके पिता के संस्कार से आया था ।  पिता गाँव के मंदिर में भजन गाते बजाते थे और कभी त्योहार के अवसर पर कुछ गा लेते थे ,लेकिन गरीबी ने कभी बड़ा अवसर न दिया । मुक्तिनाथ बचपन से ही कविता लिखने लगे थे पिता और स्कूल मास्टर से तो सराहना मिल जाती थी । पर गाँव में उन्हें उच्च वर्ग और स्वयं के वर्ग से भी विरोध का सामना करना पड़ा । कोई उन्हें नहीं पसंद करता और वे उनको नहीं पसंद करते ।
         परिस्थिति मुक्तिनाथ को पीस रही थी । वे कविता का बीज अंदर पाले अवसर का इंतजार कर रहे थे । इस बीच तीन बच्चे हुए । मुक्तिनाथ का संघर्ष भी बड़ा होता गया । अब वे कविता किस चिड़िया का नाम है भूल से गए । बेटी का विवाह कर दिया । बड़ा बेटा शहर में कमाने चला गया । मुक्तिनाथ एक दिन सोये में कुछ गाने लगे और उठ कर लिखने लगे । मुक्तिनाथ को याद आ गया कि भीतर कविता पनप रही है अवसर दिया जाए ।
          मुक्तिनाथ धीरे-धीरे अब पुरी तरह से लेखन में समय देने लगे । खेती परती रह गई । छोटे बेटे की पढ़ाई छूट गई । बेटी के विवाह के कर्जदार दरवाजे तक आने लगे । मुक्तिनाथ को पत्नी ,बेटा ,बेटी ,गाँव ,रिश्तेदार ,समाज सब कोसने लगे कि कमाई नहीं कर रहा और कविता लिख रहा । मजाक और व्यंग्य वाणों का प्रहार हुआ । लेकिन मुक्तिनाथ अब डिगने वाले नहीं थे आखिर कब तक अपने अंदर पनपे बीज पौधे से पेड़ नहीं बनने देते । अंदर पनपने वाले बीज को उखाड़ फेकने की हिम्मत भी वे नहीं जुटा पाए थे । क्योंकि साहस में कविता भीतर बड़ी थी ।
           आज बड़े बेटे के साथ पत्नी ,छोटा बेटा और मुक्तिनाथ की माँ सब इन्हें दंश देकर और स्वयं दंश सह कर शहर चले गए । मुक्तिनाथ को मुक्त करके । सबकी एक ही शिकायत थी मुक्तिनाथ ने दिया ही क्या ? पत्नी मनोरमा कहती-'एक पैसे का सुख न समझी । इनके अंदर का संतोष कोई सपना न पूरा किया '।

बेटे का कथन था-‘पिता जी पगला गए हैं कोई काम धाम तो करते नहीं कविता काग़ज पर लिखते हैं । कौन पढ़ेगा इनका लिखा ? लोग आज फेसबुक ,इंस्टाग्राम ,कू आदि पर लिख रहे हैं और उनके फालोअर्स भी हैं । एक दिन इनका लिखा रद्दी के भाव बिकेगा । देख लेना मेरा कहा सच होगा ‘।
मुक्तिनाथ को ये बातें उनको भीतर से चीर देती थी । वे तिलमिला उठते थे और कह देते-‘मत पढ़े कोई मैं किसे निमंत्रण देता हूँ कि वे आए और मेरी कविताओं को पढ़े । बिके बिक जाए रद्दी के भाव तो क्या करूँ मैं अब लिखना नहीं छोड़ूँगा तुम लोग अब बड़े हो गए हो सम्भालो अपनी जिम्मेदारी खुद । मुझसे अब और न होगा । जाओ सभी जहाँ जाना है।
मुक्तिनाथ कभी किसी कवि सम्मेलन में नहीं गए । किसी पत्रिका में नहीं छपे । किसी संगठन से नहीं जुड़े । वे सिर्फ और सिर्फ लेखकीय कर्म से जुड़े । और लिखते ही गए । दो वर्ष होने को जा रहा था । उनकी अवस्था पचास में ही अस्सी की लगने लगी थी । किसी ने मुक्तिनाथ के बारे में नहीं सोचा कि गाँव के एक घर में रह रहा यह प्राणी क्या खाता होगा ? कैसे जीता होगा ? मुक्तिनाथ का किसी से कोई संबंध नहीं था।
एक दिन पड़ोस का एक दस साल का बच्चा मुक्तिनाथ के पास आया जब मुक्तिनाथ बाहर एक टूटी खाट पर लेट कर कुछ लिख रहे थे तभी बच्चे ने पूछा-‘दादा जी आप क्या लिख रहे हैं ? माँ और सभी गाँव वाले कहते हैं कि आप पागल हो गए हैं । आपके पास मैं न जाऊँ नहीं तो आप डंडा लेकर दौड़ा देंगे मुझे’।
मुक्तिनाथ बच्चे की भावुक बाते सुनते रहे और मुस्कुरा कर रह गए । बच्चा-‘ आपने बताया नहीं आप क्या लिखते हैं ? ‘
मुक्तिनाथ-‘कविता ‘।
बच्चा ‘माँ कहती है आपका परिवार आपको छोड़ कर शहर चला गया । क्या यह सच है?
मुक्तिनाथ ( गंभीर होकर) नहीं बेटा सभी मेरे हृदय में हैं ।
मुझे कविता और परिवार को सँभालना था पर मैं कविता को ही सँभाला । वो लोग कुछ दूर हो गए । मैं स्वांतःसुखाय के लिए लिखता हूँ । गरीबी तो मेरी नियति में थी । तभी बीच में बच्चे ने टोका ‘दादा जी आज कल कविता से लोग कमाते हैं ।’
मुक्तिनाथ-‘ बेटा मैं धन कमाऊँ तो साहित्य सरिता न कमा पाऊँगा ।
बच्चा-‘नहीं दादा जी लेखन से पैसा कमाया जाता है ।’
मुक्तिनाथ -‘बेटा यह सब भ्रम है । मेरे जमाने में भी ऐसी ही कुछ हवा थी । जिनकी किस्मत चमक जाएँ उन्हें सहायता और योगदान मिलता था । मैंने भी आजमाइश की थी । मुझे जल्द पता चल गया कि पैसा-पैसे को खींचता है । मैं अपने साहित्य को बाजारूँ नहीं बनाना चाह रहा था । लड़के ने रोक कर बाजारूँ क्या दादा जी?
मुक्तिनाथ यही कि कुछ लोग मुझे पैसे दे रहे थे कि उनके नाम से कविता लिखूँ ।उनके नाम से किताब छपवाऊँ ।फिल्मों में गीत भी उनके रस छंद अलंकार को लेकर लिखूँ जो मुझसे न हुआ । जो लोग ऐसा किए वे तो कहीं कहीं दिखे पर मैं अपने इन पन्नों में ही दिखता हूँ ।इसी में एक दिन मर जाऊँगा ।
उस दिन के बाद रोज ही बच्चा आता और एक कविता माँग कर टाईप करता फिर चला जाता । वह उन कविताओं को फेसबुक ,इंस्टाग्राम ,कू पर पोस्ट करने लगा । देखते ही देखते मुक्तिनाथ की वे कविताएँ वायरल होने लगीं । उनका अनुवाद कई विदेशी भाषाओं में होने लगा । किसी प्रकाशक की नज़र पड़ी और वह कुछ कविताओं को लेकर एक किताब के रूप में छाप दिया ।
उस वर्ष की वह सर्वश्रेष्ठ पुस्तक साबित हुई और उस पर साहित्य अकादमी पुरस्कार की घोषणा हुई । पत्रकार ,मीडिया मुक्तिनाथ का इंटरव्यू लेने के लिए गाँव में आने लगे । गाँव में हलचल मच गई । सबने मीडियाकर्मियों को मुक्तिनाथ के दरवाजे तक ले आए
। पत्रकारों की आँखों में मुक्तिनाथ की दशा देखकर आँसू आ गए । घर में खाने का कोई इंतजाम नहीं था ।जब पूछा गया तो मुक्ति नाथ ने बताया कभी गन्ने का रस कभी सत्तू कभी कोई कुछ दे देता और कभी भूखा ही सही बस ऐसे ही दिन कट जाते । एक पत्रकार ने कहा-‘सर आप तो सचमुच हीरों हैं । मुक्तिनाथ ने कहा-‘नहीं मैं नहीं वास्तव में तो यह बच्चा हीरो है जिसकी वजह से आप लोग आज यहाँ तक पहुँचे हैं । मुक्तिनाथ ने उस बच्चे को पास में बुलाया और उसे गोद में उठाकर फोटो खींचवाई । तभी मुक्तिनाथ को चक्कर आ गया और वह जमीन पर गिर पड़े और मुरछित हो गए । आनन- फानन में डाक्टर आया चेक किया तो पता चला मुक्तिनाथ जी अब इस दुनिया में शरीर रूप में नहीं रहे । बच्चे को पता चला तो वह मुक्तिनाथ से लिपट कर रोने लगा । एक पत्रकार ने आँसू पोछ हुए कहा -‘लेखन को कब कर्मे समझा जाएँगा ?
सरकार भी कब विचार करेगी ।सृजनात्मक उन्नति के प्रति कब समाज ,परिवार ,सरकार में अच्छा दृष्टिकोण उत्पन्न होगा । कब लेखक का कोटा तय होगा । कब लेखक को विशेष समझा जाएगा । कब उसके महत्वपूर्ण मानसिक श्रम के एवज में उसे सुख सुविधाएंँ दी जाएँगी । क्या ऐसा ही चलता रहेगा और अनगिनत मुक्तिनाथ उचित व्यवस्था न मिल पाने के कारण असमय मरते रहेंगे ।

डा. सुनीता सिंह ‘सुधा’
वाराणसी

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