राजनगर की पब्लिक लाइब्रेरी” एक विरासत की लाश पर भ्रष्टाचार का तांडव।

21


प्रदीप कुमार नायक
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
कहते हैं कि किसी समाज का भविष्य उसके पुस्तकालयों में बसता है। लाइब्रेरी सिर्फ चार दीवारों के बीच रखी किताबें नहीं होतीं। वो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान, संस्कार और विचारों को पहुंचाने वाला पुल होती है। मधुबनी जिले की राजनगर पब्लिक लाइब्रेरी भी कभी ऐसा ही पुल थी। आजादी के बाद से ही यह लाइब्रेरी पूरे इलाके के बुद्धिजीवियों, छात्रों और आम पाठकों की सांस्कृतिक पहचान रही है। यहां बैठकर कितने अफसर, शिक्षक और पत्रकार तैयार हुए, इसका हिसाब रखना मुश्किल है।
लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आज वही लाइब्रेरी अपनी पहचान खो चुकी है। पिछले ग्यारह सालों से यहां चुनाव नहीं हुए। संस्था के संविधान में साफ लिखा है कि हर तीन साल पर नई कार्यकारिणी बनेगी। मगर सत्ता का मोह इतना गहरा है कि एक ही समूह बिना किसी जवाबदेही के दशकों से कुर्सी पर जमा हुआ है। सदस्यता शुल्क, सरकारी अनुदान और दान के रूप में लाखों रुपये हर साल आते हैं। लेकिन आज तक किसी ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं बताया कि वो पैसा गया कहां। ऑडिट रिपोर्ट मांगो तो गाली मिलती है। सवाल पूछो तो धमकी दी जाती है। पारदर्शिता और लोकतंत्र जैसे शब्द यहां से कोसों दूर हैं।
सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जिस परिसर को बच्चों की शिक्षा के लिए आरक्षित किया गया था, उसे अब कमाई का जरिया बना दिया गया है। बिहार में पूर्ण शराबबंदी है। बाल श्रम कानून सख्ती से लागू है। इसके बावजूद लाइब्रेरी के हॉल को शादियों, मुंडनों और पार्टियों के लिए किराए पर दिया जा रहा है। रात होते ही तेज आवाज में डीजे बजता है। शराब परोसी जाती है। अश्लील गानों पर नृत्य होता है। कभी-कभी तो नाबालिग बच्चे भी यहां काम करते देखे जाते हैं। सोचिए, जिस आंगन में सरस्वती की आराधना होनी चाहिए थी, वहां अब अज्ञानता और अंधकार का नाच हो रहा है। यह सिर्फ कानून का उल्लंघन नहीं है। यह हमारे समाज के नैतिक ताने-बाने पर सीधा हमला है।
इतना सब होने के बाद भी जिला प्रशासन, निबंधन विभाग और शिक्षा विभाग की चुप्पी समझ से परे है। स्थानीय अखबारों में खबरें छपीं। लोगों ने ज्ञापन दिए। सोशल मीडिया पर आवाज उठी। मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात। आखिर क्यों? क्या लाइब्रेरी कमेटी के लोग इतने ताकतवर हैं कि कानून उनके आगे बेबस हो जाए? या फिर पूरे मामले में राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है? ये सवाल आज राजनगर ही नहीं, पूरे मधुबनी की जनता पूछ रही है।
जब हमने इस सच्चाई को कलमबद्ध करने की कोशिश की तो हमें भी चुप कराने का प्रयास हुआ। कहा गया कि बदनामी होगी, केस हो जाएगा। लेकिन हम डरे नहीं। क्योंकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमें संविधान ने दी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलना हमारा कर्तव्य है। अगर आज हम चुप हो गए तो कल कोई और सार्वजनिक संस्था को भी ऐसे ही नीलाम कर देगा।
राजनगर की लाइब्रेरी कोई सरकारी संपत्ति नहीं है। यह जनता की अमानत है। यह हमारे पूर्वजों की विरासत है। इसे कुछ लोगों की जागीर नहीं बनने दिया जा सकता। इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार कठोर कदम उठाए। सबसे पहले किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश या वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में पूरे मामले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। शराबबंदी और बाल श्रम कानून तोड़ने वालों पर तुरंत एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। लाइब्रेरी की पूरी आय-व्यय का सार्वजनिक ऑडिट होना चाहिए और दोषियों से वसूली होनी चाहिए।
और सबसे जरूरी बात, साठ दिनों के अंदर निष्पक्ष चुनाव कराकर नई कमेटी बनाई जाए। लाइब्रेरी को फिर से सिर्फ पठन-पाठन, वाद-विवाद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए खोला जाए। बच्चों के लिए निशुल्क पुस्तकालय और वाचनालय शुरू किया जाए।
अगर ऐसा नहीं हुआ तो जनता को मजबूरन आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ेगा। शांतिपूर्ण धरना, हस्ताक्षर अभियान और जरूरत पड़ी तो न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा।
क्योंकि सवाल सिर्फ राजनगर की एक लाइब्रेरी का नहीं है। सवाल इस बात का है कि बिहार में कानून का राज है या माफिया का। सवाल इस बात का है कि हम अपने बच्चों को कैसा भविष्य देकर जाएंगे। ज्ञान का मंदिर बचाना होगा, वरना आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी l

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here