प्रदीप कुमार नायक
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार_
नेपाल एक बार फिर उसी मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहां से हर बार खून, आग और सवाल निकलते हैं। कोशी प्रदेश के सुनसरी जिले में देवानगंज और कप्तानगंज की छोटी सी झड़प ने बीते कुछ दिनों में पूरे देश को हिला कर रख दिया है। जो बात स्थानीय स्तर पर शुरू हुई थी वो अब तराई से निकलकर काठमांडू, पोखरा और पहाड़ तक पहुंच गई है। सड़कों पर भगवा झंडे हैं, नारे हैं, बंद हैं और बीच-बीच में धुएं के गुबार। इस बार की आग सिर्फ कानून व्यवस्था की नहीं है। इस बार सवाल पहचान का है, आस्था का है और उस नेपाल का है जो कभी दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र कहलाता था।
घटना की शुरुआत सुनसरी के सीमावर्ती इलाकों से हुई। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार देवानगंज और कप्तानगंज में दो पक्षों के बीच किसी धार्मिक या सामाजिक मुद्दे को लेकर तू-तू मैं-मैं हुई। बात बढ़ी तो प्रदर्शन शुरू हो गए। प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे, सरकारी कार्यालयों के सामने नारेबाजी हुई और फिर स्थिति बेकाबू हो गई। आरोप है कि भीड़ को रोकने के लिए पुलिस को आंसू गैस छोड़नी पड़ी और हवाई फायरिंग भी करनी पड़ी। इसी दौरान एक हिंदू युवक की मौत की खबर आई। बस फिर क्या था, एक लाश ने पूरे तराई को सड़क पर उतार दिया।
मृत्यु के बाद गुस्सा फूट पड़ा। लोग हाथों में तख्तियां लेकर निकले। मांग सिर्फ एक व्यक्ति के लिए न्याय की नहीं थी। मांग थी उस सम्मान की जो उन्हें लगता है 2015 के बाद से छिन गया है। उसी साल नेपाल ने खुद को धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र घोषित किया था। संविधान से “हिंदू राष्ट्र” शब्द हट गया था। तब से एक बड़ा वर्ग लगातार कहता आया है कि 80 प्रतिशत हिंदुओं वाले देश की आत्मा को धर्मनिरपेक्षता के लेबल से नहीं ढका जा सकता। सुनसरी में हुई घटना ने उसी पुराने घाव को फिर कुरेद दिया। अब सड़कों पर सिर्फ “न्याय दो” नहीं सुनाई दे रहा, “हमें हिंदू राष्ट्र चाहिए” की आवाज सबसे तेज है।
आग यहीं नहीं रुकी। सुनसरी से शुरू हुआ विरोध धीरे-धीरे विराटनगर, इटहरी, धरान और फिर काठमांडू तक पहुंच गया। कई जगह सरकारी इमारतों में तोड़फोड़ हुई, वाहनों को आग लगाई गई और पुलिस चौकियों पर हमले हुए। भारत से सटे जोगबनी बॉर्डर के इंटीग्रेटेड चेकपोस्ट पर भी उपद्रवियों ने आगजनी की। कपिलवस्तु में भी कुछ दिन पहले इसी तरह का तनाव देखा गया था। वहां ईद के दिन मंदिर में तेज आवाज में भजन बजने को लेकर विवाद हुआ था। मंदिर पर हमले और पुजारी से मारपीट के बाद हिंदू समुदाय सड़कों पर उतरा था। पुलिस ने आंसू गैस और फिर गोलियां चलाईं। 23 लोग घायल हुए थे। उन घटनाओं और सुनसरी की घटना को लोग अब एक साथ जोड़कर देख रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि उनकी आस्था को बार-बार निशाना बनाया जा रहा है।
इस बीच नेपाल की जेलें भी नहीं बचीं। देशभर में चल रहे विरोध और “Gen Z” आंदोलन के बीच कई जेलों पर हमले हुए। रामेछाप जेल में कैदियों ने गैस सिलेंडर से धमाका करके भागने की कोशिश की। सुरक्षाबलों की फायरिंग में तीन कैदी मारे गए। सुनसरी के झुम्का जेल से 1575 कैदी, चितवन से 700, कपिलवस्तु से 459 कैदी भाग निकले। कुल मिलाकर 15000 से अधिक कैदियों के फरार होने की खबरें हैं। जेल टूटने, आगजनी और पलायन ने माहौल को और ज्यादा अराजक बना दिया है।
भारत के लिए ये घटना महज पड़ोसी की खबर नहीं है। सुनसरी बिहार की सीमा से सटा है। अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और मधुबनी में लोग टीवी और मोबाइल पर नजरें गड़ाए बैठे हैं। सोनौली और बढ़नी बॉर्डर पर आवाजाही धीमी है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर हैं। महाराजगंज, हरदौना और बहादुरगंज में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। क्योंकि धर्म और संस्कृति की आग सीमा नहीं देखती। यहां जो होता है उसकी गूंज इधर भी आती है। सोशल मीडिया पर “रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा” की पंक्तियां फिर से शेयर हो रही हैं। लोगों को लग रहा है कि जब धर्म तो होगा लेकिन शर्म नहीं होगी, तब ऐसी ही घटनाएं होंगी।
अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि नेपाल जाएगा किधर। सरकार के सामने दो रास्ते हैं। पहला रास्ता दमन का है। और ज्यादा पुलिस, और ज्यादा प्रतिबंध, और ज्यादा गिरफ्तारियां। लेकिन इससे समस्या दबेगी नहीं, सिर्फ अंदर ही अंदर सुलगती रहेगी। दूसरा रास्ता संवाद का है। निष्पक्ष जांच हो कि गोली किसके आदेश पर चली, किसने पहले हमला किया। दोषियों को कानून के सामने लाया जाए चाहे वो किसी भी समुदाय के हों। साथ ही उन लोगों से बात की जाए जो “हिंदू राष्ट्र” की मांग कर रहे हैं। उनकी बात को सुना जाए, खारिज नहीं किया जाए।
“हिंदू राष्ट्र” का मतलब कट्टरता नहीं है। नेपाल में इसका मतलब हमेशा से सहिष्णुता रहा है।पशुपतिनाथ की छाया में बौद्ध भी पले, मुसलमान भी रहे, ईसाई भी रहे। लेकिन देश की मूल पहचान सनातन रही। लोग चाहते हैं कि संविधान में वो पहचान वापस आए। उन्हें डर है कि अगर पहचान मिट गई तो संस्कृति भी मिट जाएगी।
एक युवक की मौत ने पूरे देश को रोक कर सोचने पर मजबूर कर दिया है। क्या हम संवाद से चलेंगे या संघर्ष से। क्या हम इतिहास को मिटाकर भविष्य बनाएंगे या इतिहास को साथ लेकर चलेंगे। नेपाल के पास मौका है कि वो दुनिया को दिखाए कि हिंदू राष्ट्र का आदर्श क्या होता है। वो आदर्श जिसमें सबके लिए जगह है, सबकी इज्जत है, लेकिन जड़ें भी सुरक्षित हैं।
ईश्वर उस दिवंगत आत्मा को शांति दे जिसके घर का चिराग बुझ गया। और नेपाल के नेताओं को सद्बुद्धि दे कि वो फैसला लें जिससे फिर कोई मां को अपना बेटा न खोना पड़े। क्योंकि अगर अब भी नहीं चेते तो ये चिंगारी सिर्फ सुनसरी तक नहीं रुकेगी। ये पूरे उपमहाद्वीप की शांति को जला देगी।
























































